जेएनएन, बदायूं : रोशनी के पर्व दीपावली की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। दीपोत्सव पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने को मिट्टी के दीपक और करवाचौथ पर सुहागिन को उपवास रखने को करवा बनाने वाले कुम्हारों के चाक ने भी रफ्तार पकड़ ली है। कोरोना काल से प्रभावित कुम्हारों को अब आर्थिक संकट से उबरने की उम्मीद जागी है। इससे कुम्हार अभी से पूरे दिन मेहनत करके चाक से मिट्टी को आकार दे रहे है।

दीपोत्सव के लिए लोग घरों की सफाई के साथ ही रंगाई पुताई में व्यस्त हैं। वहीं, कुम्हार भी तेजी से दीया बनाने में जुटे हैं। इधर, बदलते ट्रेंड के साथ डिजाइनर दीया भी लोगों का मन मोह रहे है। चीन निर्मित उत्पादों के बहिष्कार से मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ी है। शहर के पनवाड़ी, नहरखां सराय, जालंधरी सराय समेत करीब आधा दर्जन मुहल्लों में कुम्हार समाज के तीस परिवार हैं। महंगी हुई मिट्टी से बढ़ रही दिक्कत

बदलते दौर में इलेक्ट्रिक चाक भी आ गए है। मगर अभी भी शहर में हाथ के चाक से मिट्टी के बर्तनों को आकार दिया जा रहा है। मुहल्ला पनवाड़ी निवासी भागीरथ ने बताया यह उनका पुश्तैनी काम है। महंगाई के दौर में मिट्टी भी महंगी आ रही है। एक दिन में करीब 500 दीपक बना लेते है। इसमें लागत को हटाकर ढाई सौ रुपये की आमदनी होती है। चाक से मिट्टी के दीया, करवा, गोलक, मटकी समेत अन्य बर्तन बनाने का काम किया जा रहा है। चीनी झालरों के बहिष्कार से बढ़ रही मांग

दीपावली रोशनी का पर्व है। लोग घरों को सजाने के लिए झालरों, कंडिल, समेत विभिन्न सजावट के समान खरीदकर लाते है। जिसमें मिट्टी के दीपक का महत्व अलग है। भले ही लोग मोमबत्ती और झालरों से रोशनी ज्यादा रोशनी कर लें। मगर, बिना दीया की रोशनी के घर जगमग नहीं है। इस बार चीन निर्मित झालरों के बहिष्कार के चलते दीपावली पर मिट्टी के दीपक की मांग बढ़ गई है।

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