बदायूं, जेएनएन। महात्मा गांधी का सपना था स्वदेशी अपनाओ। चरखा चलाओ देशी पहनो और देशी खाओ, लेकिन वर्तमान के हालात तो ऐसे हैं कि सिस्टम सुस्त हुआ है। अफसर लापरवाह हैं। बजट के अभाव में संसाधन कम हो गए हैं। खादी के कपड़े भी महंगे हुए हैं इसलिए लोगों ने विदेशी कपड़ों को ज्यादा अपनाया है। यही कारण है कि गांधीजी का चरखा खूंटी पर टंगा हैं और चलाने को रुई तक नहीं है।

जिले में पांच खादी आश्रम खादी भंडार संचालित हैं। इसमें एक छह सड़का, एक लालपुल मार्ग, एक पथिक चौक व शेष अन्य जगहों पर है। खादी आश्रम पर बजट का अभाव है, केवल रुई और कपड़ा विभाग से मिलता है वह बिकता है लेकिन स्थानीय स्तर की खरीद बंद है। विभाग से मिलने वाली रुई और कपड़ा बाजार रेट से चार गुना महंगा है। इसके चलते गांधी आश्रम के कपड़े लोग खरीद नहीं सकते। 

चरखा चलाने को रुई नहीं

दुकान प्रबंधक ने बताया कि यहां चरखा खूंटी पर टंगे हैं लेकिन रुई स्थानीय स्तर पर खरीद नहीं सकते शासन से मिली नहीं है इसलिए चरखे चल नहीं पा रहे। हालात यह हैं कि दो अक्टूबर पर चरखा चलाने को भी रुई नहीं है मगर अफसरों का फरमान है तो व्यवस्था कर आज छह सड़का दुकान पर चरखा चलवाएंगे। उन्होंने बताया कि दो अक्टूबर से 20 प्रतिशत छूट का लाभ लोगों को मिलेगा।

खादी की सीजन आज से शुरू

आज गांधी जयंती है। खादी आश्रम के अनुसार आज से ही खादी का सीजन शुरू हो जाएगा। जिले में पांच खादी आश्रम की दुकानें हैं इन दुकानों पर आउट सीजन में भी एक दुकान तीन से चार लाख की खरीद कर लेती है। सभी दुकानें करीब दस-15 लाख रुपये की बिक्री करती हैं। सीजन में महीने की बिक्री पांच से छह लाख प्रति दुकान हो जाएगी। 

स्थानीय स्तर पर रुई खरीदने का आदेश नहीं

छह सड़का गांधी आश्रम केंद्र के प्रबंधक महेंद्र सिंह यादव ने कहा कि खादी का सीजन दो अक्टूबर से शुरू हो जाता है, वैसे हम महीने में चार से पांच लाख रुपये का कपड़ा बिक्री कर लेते हैं क्रेज कम हुआ है, लेकिन लोग आज भी खरीदते हैं। 

उन्होंने कहा, दिक्कत बस इतनी है कि बाजार में रुई 150 रुपये किलो है तो विभाग से 400 रुपये किलो मिलती है। बनाने के बाद कपड़ा बहुत महंगा पड़ता है। हमें स्थानीय स्तर पर रुई खरीदने का आदेश नहीं है। कल दो अक्टूबर पर चरखा चलाना है, लेकिन रुई तक नहीं है कैसे भी व्यवस्था कर चलाएंगे।

Edited By: Rahul Patel

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