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कत्ल, फांसी और फिर सब बरी: 7 साल बाद उठा सवाल- आखिर किसने ली गोविंद और आशा की जान?

Published: Fri, 02 Oct 2026 04:55 PM (IST)

बदायूं के उरैना गांव में 2017 में प्रेमी युगल गोविंद-आशा की हत्या के मामले में हाईकोर्ट ने चार दोषियों को ...और पढ़ें

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HighLights

  1. गोविंद के पिता बोले, आर्थिक तंगी में नहीं कर सके पैरवी, अब सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए भी नहीं हैं पैसे

उमेश राठौर, बदायूं। 14 मई 2017 की सुबह वजीरगंज के उरैना गांव में दो लाशें मिली थीं। किशनलाल के घर के बाहर गली में उसकी बेटी आशा का खून से लथपथ शव पड़ा था, जबकि करीब 10 कदम अंदर बरामदे में उसके प्रेमी गोविंद की लाश थी। दोनों की धारदार हथियार से हत्या की गई थी।

गोविंद के पिता पप्पू ने आशा के पिता किशनलाल, मां जलधारा और भाइयों विजयपाल व रामवीर पर हत्या का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

वर्ष 2022 में ट्रायल कोर्ट ने चारों को फांसी की सजा सुनाई, लेकिन हाल में हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। अब सवाल है कि यदि दोष मुक्त हो चुके लोगों ने हत्या नहीं की तो प्रेमी युगल को किसने मौत के घाट उतारा?

हालांकि सरकारी अधिवक्ता अनिल सिंह राठौर ने कहा है कि हाईकोर्ट का फैसला अंतिम नहीं है। अभियोजन पक्ष इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगा और गोविंद-आशा को न्याय दिलाने का प्रयास करेगा।

पांच सवालों पर ढह गई अभियोजन की कहानी

आरोपितों के अधिवक्ता आरपीएस चौहान ने हाईकोर्ट में अभियोजन के साक्ष्यों पर सवाल उठाए। गांव की रेशमा को एकमात्र चश्मदीद बताया गया था, लेकिन वह अदालत में अपने बयान से मुकर गईं।

प्राथमिकी दर्ज कराने वाले पप्पू ने भी स्वीकार किया कि वह घटना के समय खेत पर थे और उन्होंने हत्या होते नहीं देखा। घटनास्थल के आसपास धर्मवीर, प्रेमपाल, मुनव्वर और नंदराम के घर थे।

दिन में हुई दो हत्याओं के दौरान किसी ने चीख-पुकार क्यों नहीं सुनी, इसकी पड़ताल नहीं की गई। हथियारों की बरामदगी को लेकर भी विरोधाभास सामने आया।

पुलिस ने गड़ासा और कुल्हाड़ी जंगल से बरामद होने की बात कही, जबकि पप्पू के अनुसार हथियार शवों के पास पड़े थे। एफएसएल जांच में खून की पुष्टि हुई, लेकिन उसका ब्लड ग्रुप स्पष्ट नहीं हो सका।

रिपोर्ट भी अदालत में पेश नहीं की गई। अभियोजन की घर के भीतर हत्या होने की दलील पर भी सवाल उठा। दरवाजे खुले थे और आशा का शव गली में पड़ा था। ऐसे में दोनों की हत्या की परिस्थितियों को लेकर संदेह सामने आया।

पन्नी की झोपड़ी में रह रहा पिता, अब सुप्रीम कोर्ट की आस

गोविंद के पिता पप्पू के पास एक बीघा जमीन भी नहीं है। वह पन्नी डालकर बनी झोपड़ी में रहते हैं। उनका कहना है कि ट्रायल कोर्ट से फांसी की सजा होने पर न्याय की उम्मीद जगी थी, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण हाईकोर्ट में प्रभावी पैरवी नहीं कर सके।

उनके मुताबिक, गांव के गवाहों को धमकाया गया, जिससे कोई सामने नहीं आया। अब सुप्रीम कोर्ट जाने तक के रुपये नहीं हैं। पप्पू और उनकी पत्नी चंपा देवी का आरोप है कि आशा और गोविंद एक-दूसरे से प्रेम करते थे और शादी करना चाहते थे।

आशा पहले भी गोविंद के साथ जा चुकी थी। उनका दावा है कि शादी का भरोसा देकर गोविंद को गांव बुलाया गया था। शादी की तारीख तय होने के बाद तैयारियां चल रही थीं।

आरोप लगाते हुए कहा कि इसी दौरान आशा का भाई विजयपाल गोविंद को घर ले गया, जहां उसकी हत्या कर दी गई। आशा भी उसे बचाने पहुंची तो उसकी हत्या कर दी गई।

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