बदायूं के चर्चित गोविंद-आशा हत्याकांड में चारों आरोपी बरी, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फांसी की सजा रद की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बदायूं के चर्चित गोविंद-आशा दोहरे हत्याकांड में निचली अदालत के फांसी के फैसले को पलट दिया है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट।
HighLights
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बदायूं दोहरे हत्याकांड का फैसला पलटा।
निचली अदालत से फांसी पाए चार आरोपी बरी हुए।
साक्ष्य के अभाव में अभियोजन पक्ष हत्या साबित नहीं कर सका।
जागरण संवाददाता, बदायूं। वजीरगंज थाना क्षेत्र के सबसे चर्चित प्रेमी युगल गोविंद और आशा हत्याकांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला कोर्ट का फैसला पलट दिया है।
इस मुकदमें में निचली अदालत ने दंपती और उनके दो बेटों को फांसी की सजा सुनाई थी। अब हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है। कहा है कि उनपर केवल शक है साक्ष्य नहीं मिले हैं।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने मुकदमें में सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन हत्या को संदेह से परे साबित करने में फेल रहा। कोर्ट ने डेथ रेफरेंस खारिज कर दिया और विजय पाल, रामवीर, किशन लाल और उसकी पत्नी जलधारा की अपील मंजूर कर ली।
यह मामला 14 मई 2017 का है। गांव उरैना निवासी गोविंद का अपने पड़ोस की आशा से प्रेम प्रसंग चल रहा था। गोविंद के पिता का कहना था कि कुछ दिन पहले आशा और गोविंद गांव छोड़कर भाग गए थे।
बदायूं सेशन कोर्ट से हुई थी फांसी की सजा
आशा के पिता ने उन्हें शादी का लालच दिया था और उन्हें गांव बुला लिया था। इसी की बात करने के बहाने किशनलाल ने गोविंद को अपने घर बुलाया था और उसके ऊपर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया था। आरोप था कि इसमें किशनलाल की पत्नी जलधारा, बेटा रामवीर व विजयपाल भी शामिल थे। आशा ने गोविंद को बचाने का प्रयास किया था। इससे परिवार के लोगों ने उसे भी कुल्हाड़ी से मार दिया था।
पुलिस ने ऑनर किलिंग मानते हुए गोविंद के पिता पप्पू की तहरीर पर चारों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की और सभी के खिलाफ चार्जशीट लगाई। बदायूं सेशन कोर्ट ने 22 सितंबर 2022 को चारों को फांसी की सजा सुनाई थी।
इन आधार पर आरोपियों को किया गया बरी
हाईकोर्ट ने अपने 12 पेज के आदेश में पांच बिंदुओं पर अभियोजन को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। पहला इकलौती चश्मदीद ही पलट गई। गांव की रेशमा, जिसने पहले कहा था कि उसने हत्या देखी, वह जिरह में कहने लगी कि उसने कुछ देखा ही नहीं। दूसरा प्राथमिकी लिखाने वाला खुद गवाह नहीं। पप्पू ने माना कि वह सुबह काम पर चला गया था।
तीसरा पड़ोसी चुप रहे, पुलिस भी चुप रही। कोर्ट ने नक्शा देखा तो किशन लाल का घर धर्मवीर और प्रेमपाल के बीच घिरा था, सामने मुनव्वर और नंदराम रहते हैं। सुबह-सुबह दो लोगों को मारा गया लेकिन किसी पड़ोसी ने चीख-पुकार नहीं सुनी। हैरानी की बात यह कि पुलिस ने इन चारों में से किसी को न तो पूछा, न गवाह बनाया।
चौथा हथियारों की कहानी में झोल। जांच अधिकारी कहता है गड़ासा विजय पाल के और कुल्हाड़ी किशन लाल के बताने पर जंगल से मिली। वहीं पप्पू कहता है हथियार तो लाश के पास ही पड़े थे। एफएसएल में खून तो मिला, पर ब्लड ग्रुप ही नहीं पता चला और रिपोर्ट को कोर्ट में शामिल तक नहीं किया गया।
पांचवा ये कि घर खुला था, तो 106 कैसे लगेगा, सरकार ने कहा था कि लाश घर में मिली, इसलिए घर वालों को बताना चाहिए कि कैसे मरी। हाईकोर्ट ने कहा कि घर बंद ही नहीं था। दरवाजे खुले थे, पुलिस आराम से अंदर गई। एक लाश बाहर सड़क पर पड़ी थी। अगर आरोपियों ने ही मारकर आशा को बाहर फेंका तो गोविंद को अंदर क्यों छोड़ दिया, जवाब किसी के पास नहीं। इन्हीं आधार पर चारों आरोपितों को बरी किया गया है।
