जयप्रकाश निषाद, आजमगढ़

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जनपद के सठियांव ब्लाक के नीबी गांव के अखाड़े में प्रतिदिन दंगल होता है, लेकिन यहां दंगल लड़कियों के बीच होता है। पूरा अखाड़ा लड़कियों के नाम समर्पित है। अन्नू यादव सरीखी दर्जनों 14 वर्ष से कम की लड़कियां नंदिनी चौहान, महिमा गौतम और कंचन राष्ट्रीय फलक पर अपना नाम रोशन करने में जुटी हैं। झंडा बुलंद करने में इनके परिवार के लोग दो कदम आगे बढ़कर इनको संरक्षण दे रहे हैं। पापा की प्यारी इन लड़कियों का एक ही अरमान है ओलंपिक में मेडल जीतना। अपने सपने को साकार करने के लिए यह जीजान से जुटी हुई हैं।

बारह वर्षीय अन्नू यादव पिता हरिकेश यादव लालसा कृषक इंटर कालेज नीबी मोहब्बतपुर सठियांव में कक्षा पांच की छात्रा है। मां नीलम देवी गृहणी हैं। पिता प्राइवेट फर्म में काम करते हैं। बड़ी बहन सोनम कक्षा आठ की छात्रा है। छोटा भाई रवि यादव कक्षा तीन में पढ़ता है। अन्नू के चाचा बाबूलाल यादव कुश्ती में जनपद के 'बालकेशरी' रह चुके हैं। शुरू से ही अन्नू की कुश्ती में दिलचस्पी थी। इसी वजह से वह नीबी मोहब्बतपुर स्थित लालसा क्लब अखाड़े के संचालक अवधेश यादव के संपर्क में आई। साल भर पूर्व उसने अखाड़े में प्रवेश लिया और अपनी उम्र की लड़कियों से कुश्ती लड़ती रही। बारह साल की अन्नू को देखने से नहीं लगता कि वह पहलवान है, लेकिन उसके दांव-पेच हर किसी को अचंभित करते हैं। अन्नू ने कहा कि उसका मकसद बड़ी प्रतियोगिता में भागीदारी कर जनपद को गोल्ड मेडल दिलाना है। स्कूली प्रतियोगिता में वह प्रतिभाग नहीं कर पाई है लेकिन आगे की प्रतियोगिता के लिए वह पूरी तरह से मेहनत कर रही है। आगे अधिक से अधिक प्रतियोगिताओं में अपनी भागीदारी निभाएगी।

33 किग्रा में मिला गोल्ड मेडल

पिछले मई माह में उसे गाजियाबाद में आयोजित अंडर-15 यूपी स्टेट रेस्िलग चैंपियनशिप-2018 में खेलने का मौका मिला। यहां 33 किग्रा भार वर्ग में अन्नू ने गोल्ड मेडल प्राप्त किया। पहली बार कुश्ती प्रतियोगिता में शामिल होने गई अन्नू गोल्ड मेडल लेकर आएगी किसी को विश्वास नहीं हो रहा था। इसके 20 दिन बाद ही मेरठ में नेशनल प्रतियोगिता हुई। इस दौरान दो कुश्ती में उसने बाजी मारी लेकिन एक कुश्ती में वह परास्त हो गई। कई अन्य बालिकाएं भी सीख रहीं कुश्ती की कला

नीबी गांव में अन्नू सरीखी कई अन्य लड़कियां भी कुश्ती में दाखिला लेकर अपने सपने को साकार करने में जुटी हुई हैं। इस विडंबना कहे या जो नाम दे लें अभिभावक भी अपनी लड़कियों को कुश्ती में दाखिला दिलाने को आतुर हैं। इसी का नतीजा है कि कई बालिकाएं आज कुश्ती के बल पर सरकारी नौकरी कर रही हैं।

Posted By: Jagran

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