पिता का साया उठा तो खुद बनीं परिवार का सहारा, अयोध्या की सबीना बनीं 'ड्रोन दीदी', सैकड़ों महिलाओं को दी नई दिशा
संडवा गांव की सबीना खातून ने पिता के निधन के बाद आर्थिक संकट से जूझते हुए स्वयं को परिवार का ...और पढ़ें
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HighLights
पिता के निधन के बाद सबीना बनीं परिवार का सहारा।
'ड्रोन दीदी' के रूप में आधुनिक कृषि को बढ़ावा दे रहीं।
प्राकृतिक खेती और महिला स्वावलंबन से 322 किशोरियों को सशक्त किया।
प्रहलाद तिवारी, अयोध्या। उम्र महज 19 वर्ष थी, जब पिता का साया सिर से उठ गया। परिवार पर आर्थिक संकट गहराया तो भविष्य की राह भी मुश्किल नजर आने लगी। मगर मवई ब्लाक के संडवा गांव की सबीना खातून ने परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय खुद को परिवार का सहारा बनाया। स्वयं सहायता समूह से शुरू हुआ उनका सफर आज आधुनिक कृषि, प्राकृतिक खेती और महिला स्वावलंबन की मिसाल बन चुका है। कभी मुश्किलों से जूझने वाली शबीना अब 322 किशोरियों को आत्मनिर्भरता की राह दिखा रही हैं।
वर्ष 2014 में पिता मो. शफीक खां के निधन के बाद सबीना ने आत्मनिर्भर बनने का संकल्प लिया। खेती-किसानी से जुड़ कर उन्होंने नई तकनीक अपनाई और गांव की महिलाओं को जोड़ा। आज उनकी पहचान ड्रोन दीदी और प्रगतिशील महिला किसान के रूप में है। केंद्र सरकार से मिले करीब 12 लाख रुपये मूल्य के कृषि ड्रोन के जरिए वह किसानों के खेतों में खाद, उर्वरक और कीटनाशकों का छिड़काव करती हैं।
धान, गेहूं, गन्ना, केला, सरसों और मक्का सहित विभिन्न फसलों में ड्रोन से छिड़काव कर वह अब तक 2027 एकड़ में सेवा दे चुकी हैं। वह प्रति एकड़ 400 रुपये लेती हैं। इस तकनीक से किसानों का समय और पानी बचता है, वहीं जहरीले रसायनों से फसल की सुरक्षा होती है। उनकी आय को भी मजबूती मिली है।
सबीना को सीएम योगी आदित्यनाथ सम्मानित कर चुके हैं। एमए, एमएसडब्ल्यू और डीएलएड तक शिक्षित सबीना का मानना है कि आधुनिक तकनीक से खेती सहित स्वरोजगार से महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत बन सकती हैं।
प्राकृतिक खेती से मिट्टी को संवारने की पहल
सबीना रासायनिक खेती पर निर्भरता घटाने के लिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही हैं। सब्जियों और अनाज की कई किस्मों के साथ वह अमरूद के बाग में सहफसली खेती भी करती हैं। जीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र, गोबर और गोमूत्र से तैयार जैविक उत्पादों का इस्तेमाल कर रही हैं। हाइड्रोपोनिक तकनीक से स्ट्राबेरी और रंगीन शिमला मिर्च की खेती का प्रयोग भी कर चुकी हैं। इस वर्ष प्राकृतिक खेती से अधिक लोगों को जोड़ने के लिए उन्होंने लौकी के एक हजार पौधे निश्शुल्क वितरित किए।
महिलाओंं के लिए रोजगार का रास्ता
उनका स्वयं सहायता समूह सिंगल बड चिप तकनीक से गन्ने की पौध तैयार कर किसानों को उपलब्ध कराता है। इस तकनीक से वह डेढ़ लाख पौध की नर्सरी तैयार करती हैं। महिला स्वावलंबन की उनकी पहल से 322 किशोरियों को नई दिशा मिली है।
