राम मंदिर चढ़ावा चोरी: संतों को हताश कर गया चंपतराय का इस्तीफा, अंतरिम महासचिव कृष्णचंद्र के सामने होगी बड़ी चुनौती
रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के निवर्तमान महामंत्री चंपतराय का त्यागपत्र स्वीकार हो गया है, जिससे संतों में निराशा है। अंतरिम ...और पढ़ें

कृष्णचंद्र (बाएं) चंपतराय (दाएं)। फाइल फोटो
HighLights
चंपतराय का त्यागपत्र स्वीकृत, संतों को साधने की चुनौती।
अंतरिम महासचिव कृष्णचंद्र के लिए संत संबंध अहम।
रघुवरशरण, अयोध्या। रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के निवर्तमान महामंत्री चंपतराय को महासचिव पद पर बनाये रखने के लिए संतों ने व्यापक अभियान छेड़ा, किंतु उनका प्रयास बेअसर सिद्ध हुआ। ट्रस्ट की नियमावली के अनुरूप उनका त्यागपत्र प्रस्तुत किए जाने के साथ स्वत: स्वीकृत हो गया। इसके साथ ही न केवल चंपतराय, बल्कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से अयोध्या के संबंधों-सरोकारों के एक युग का अवसान हो गया।
राम मंदिर जैसे आस्था के महनीय केंद्र के निर्माण और उसके प्रबंधन से जुड़ी अति व्यस्तता के चलते चंपतराय पर अहंकारी होने का भी आरोप लगता रहा। तथापि स्थानीय लोगों से उनके संबंधों की गर्माहट बराबर अनुभूत होती रही और बराबर ऐसे अवसर आते रहे जब रामलला के दरबार तक कोई भेंट या संदेश पहुंचाने से लेकर अपनी अन्य जरूरत के लिए संतों की चंपतराय से भेंट होती रही।
अनेक अवसरों पर चंपतराय भी आमंत्रण पर विभिन्न मंदिरों में नजर आते रहते थे। श्रीराम और रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से स्वाभाविक निकटता के बावजूद कुछ अवसरों पर संतों का ट्रस्ट और संघ परिवार का रिश्ता तलवार की धार पर तय होता रहा।
राम मंदिर से लेकर अयोध्या के धार्मिक-सांस्कृतिक मामलों की दिशा तय करने के सवाल पर अस्मिताओं की सूक्ष्म असहमतियां भी यदाकदा कौंधा करती थीं। ऐसे में चंपतराय की संतों के बीच साख और विश्वसनीयता सहायक सिद्ध होती थी और वह प्राय: संतों को विहिप अथवा तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के बैनर तले एकत्र करने में कामयाब रहते थे।
तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अंतरिम महासचिव बनाए गए भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी कृष्णचंद्र के सामने अपने पूर्ववर्ती की विरासत आगे बढ़ाने की चुनौती होगी और उनके सामने अयोध्या के सर्वाधिक अहम प्रतिनिधि के तौर पर विरक्त धर्माचार्यों से मधुर संबंध बना कर रखने की बाध्यता भी होगी।
तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अपने गठन के प्रारंभिक दौर में वैशिष्ट्य, अनुशासन और आदर के लौह कवच से भी संरक्षित प्रतीत होता था, तब संत समाज को साधे रखना अधिक कठिन भी नहीं था, किंतु चढ़ावा चोरी के बाद ट्रस्ट के प्रति पूर्व जैसी शिष्टता बनाए रखना तो और भी कठिन होगा। ऐसे में चंपतराय जैसे किरदार की अहमियत और बढ़ जाती है।
भविष्य की चुनौती की ओर इशारा
महामंडलेश्वर एवं डांडिया मंदिर के महांत गिरीशदास जैसे लोगों की टिप्पणी भी ट्रस्ट के सामने भविष्य की चुनौती की ओर इशारा करती है। वह हरदोई के रहने वाले अंतरिम महासचिव की ओर संकेत करते हुए कहते हैं, रामलला की सेवा-अर्चना का प्रबंध करने के लिए क्या अयोध्या में कोई व्यक्ति नहीं है।
त्यागपत्र के बाद भी संतों द्वारा समादृत
त्यागपत्र के बाद भी संत समाज के लोग चंपतराय के प्रति आदर व्यक्त कर रहे हैं। आंजनेय सेवा संस्थान के अध्यक्ष एवं रामकचेहरी मंदिर के महांत शशिकांतदास दोहराते हैं, चंपतराय निर्दोष हैं और एसआइटी की जांच रिपोर्ट से भी साफ है कि उनका त्यागपत्र वापस किया जाना चाहिए था। पत्थर मंदिर के महांत मनीषदास का भी चंपतराय के प्रति समादर ज्ञापित होता है। वह कहते हैं, उन्होंने त्यागपत्र देकर नैतिकता का परिचय दिया और उनके अधीन रहने वाले भले चोर हों, किंतु चंपतराय बेदाग हैं।
‘अंतरिम महासचिव को अतिरिक्त सजगता का परिचय देना होगा’
जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वमी रामदिनेशाचार्य यद्यपि ट्रस्ट की बैठक में लिए गए निर्णय का स्वागत करते हैं, किंतु चंपतराय से उपजी शून्यता भरना आसान नहीं मानते। वह कहते हैं, इसकी भरपाई के लिए ट्रस्ट के अंतरिम महासचिव को अतिरिक्त सजगता का परिचय देना होगा।
