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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 10, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

'पंजे' का गढ़ थी यूपी की यह लोकसभा सीट, स्वतंत्रता के बाद यहां से दूसरी बार चुनाव से पहले बाहर हुई कांग्रेस, जानें- किस वजह से हटना पड़ा पीछे

Published: Wed, 10 Apr 2024 01:44 PM (IST)Updated: Wed, 10 Apr 2024 03:33 PM (IST)

Lok Sabha Election फैजाबाद संसदीय सीट हमेशा से कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। यहां 1998 को छोड़ शेष निर्वाचन ...और पढ़ें

Lok Sabha Election कांग्रेस को यह सीट सहयोगी दलों के लिए छोड़नी पड़ी।
Lok Sabha Election कांग्रेस को यह सीट सहयोगी दलों के लिए छोड़नी पड़ी।

 नवनीत श्रीवास्तव, अयोध्या। Lok Sabha Election स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 25 वर्ष तक कांग्रेस का गढ़ रही फैजाबाद संसदीय सीट पर 2024 में दूसरी बार ऐसा अवसर आया है, जब देश की सबसे पुरानी पार्टी चुनाव मैदान से बाहर है। दोनों ही बार समझौते के कारण कांग्रेस को यह सीट सहयोगी दलों के लिए छोड़नी पड़ी।

वर्ष 1998 में पहली बार भाकिका पार्टी के लिए छोड़ी थी सीट

वर्ष 1998 में पहली बार कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था, बल्कि यह सीट सहयोगी दल भारतीय किसान कामगार पार्टी के लिए छोड़ दी थी। गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर दीनानाथ दीनबंधु दास ने चुनाव लड़ा था।

मतदाताओं और संसदीय क्षेत्र की राजनीति में दीनानाथ दीनबंधु दास नया नाम थे। बल्लाहाता निवासी दास का प्रदर्शन प्रभावशाली नहीं रहा। तत्समय चुनाव में दास को 1717 मत मिले थे। वह मात्र 0.26 प्रतिशत वोट प्राप्त कर सके।

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चुनाव में दिग्गज नेता रहे दिवंगत मित्रसेन यादव के रूप में सपा को फैजाबाद सीट पर पहला सांसद मिला था। मित्रसेन ने 1998 के लोस चुनाव में 38.44 प्रतिशत यानी दो लाख 53 हजार, 331 मत प्राप्त कर विजय पाई थी। 2024 में दूसरी बार ऐसा अवसर आया है, जब कांग्रेस ने सहयोगी दल सपा के लिए फैजाबाद संसदीय सीट छोड़ी है। सपा ने राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी पूर्व मंत्री व मिल्कीपुर से विधायक अवधेश प्रसाद को प्रत्याशी घोषित किया है।

आपातकाल के बाद हुए चुनाव में हारी थी कांग्रेस

इन दो चुनावों के अलावा शेष सभी में कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी उतारा और पूरे दमखम से चुनाव भी लड़ा। वर्ष 1957 में कांग्रेस से राजाराम मिश्र, 1962 में बाबू बृजवासीलाल, 1967 व 71 में आरके सिन्हा सांसद चुने गए थे। कांग्रेस को पहली बार 1977 के चुनाव में हार मिली।

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आपातकाल के बाद हुए इलेक्शन में भारतीय लोकदल के अनंतराम जायसवाल ने विजय प्राप्त की थी। कांग्रेस के टिकट से चुनाव में उतरे आरके सिन्हा को पराजय का सामना करना पड़ा था, लेकिन अगले ही चुनाव में कांग्रेस ने धमाकेदार वापसी की। कांग्रेस के टिकट से 1980 में चुनाव में उतरे जयराम वर्मा ने 45.6 प्रतिशत (एक लाख 37 हजार चार) मत प्राप्त कर विजय पाई थी। 1984 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में उतरे निर्मल खत्री पहली बार सांसद बने।

20 वर्ष बाद 2009 में कांग्रेस के टिकट से निर्मल खत्री पहुंचे थे संसद

1998 को छोड़ शेष निर्वाचन में कांग्रेस ने पूरी दमदारी से चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस को दोबारा विजय प्राप्त करने में 20 वर्ष लग गए। इस दौरान यह सीट कभी भगवा हुई तो कभी लाल सलाम की गूंज रही। सपा और बसपा को भी एक-एक बार विजय प्राप्त हुई।

यहां 1989 में सीपीआइ से मित्रसेन यादव, 1991 में भाजपा से विनय कटियार, 1996 में दोबारा विनय कटियार, 1998 में सपा के टिकट पर मित्रसेन यादव, 1999 में भाजपा से विनय कटियार, 2004 में बसपा से मित्रसेन यादव ने विजय प्राप्त की। इस दौरान 1998 को छोड़ कांग्रेस ने सभी चुनाव लड़े, लेकिन 20 वर्ष बाद 2009 में कांग्रेस के टिकट से निर्मल खत्री लोकसभा पहुंचे थे। इसके बाद 2014 व 2019 में लल्लू सिंह सांसद चुने गए। इस बार भी वह भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में हैं।

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