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अयोध्या दीपोत्सव से बदली कुम्हारों की किस्मत, दायरे बढ़ने से कारोबार में भारी उछाल

Published: Mon, 26 Oct 2026 07:47 PM (IST)

दीपोत्सव अब कुम्हारों के लिए केवल आस्था नहीं, बल्कि रोजगार का बड़ा माध्यम बन गया है। अयोध्या में मिट्टी के ...और पढ़ें

अयोध्या दीपोत्सव से बदली कुम्हारों की किस्मत।

अयोध्या दीपोत्सव से बदली कुम्हारों की किस्मत।

HighLights

  1. दीपोत्सव से कुम्हारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़े।

  2. मिट्टी के दीयों की मांग से आय में भारी वृद्धि।

  3. इलेक्ट्रिक चाक से उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता में सुधार।

जागरण संवाददाता, अयोध्या। दीपोत्सव अब केवल आस्था और परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि कुम्हारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने का माध्यम भी बन रहा है। दीपोत्सव को भव्य स्वरूप दिए जाने से मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ी है, जिसका लाभ कुम्हार परिवारों को मिल रहा है।

कभी रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों का रुख करने वाले इन परिवारों के युवा अब अपनी ही धरती पर पारंपरिक कला के जरिए आजीविका कमा रहे हैं। मिट्टी के दीये बनाने की परंपरा को नई पहचान देने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी दीपोत्सव ने मजबूती दी है। जयसिंहपुर के 40 कुम्हारों का तो दीपोत्सव ने जीवन ही बदल दिया है।

दीपोत्सव की आभा केवल रामनगरी तक अब सीमित नहीं रही। 84 कोस में दीपोत्सव का उल्लास छा रहा है। तमसा तट, दशरथ समाधि, नंदीग्राम, मां कामाख्या धाम, अमौनी धाम, हरिचन पुर, गजाधर दास की तपोभूमि भूला मऊ आदि धार्मिक स्थलों पर दीपोत्सव का आयोजन होता है। इनमें लाखों की संख्या में दीये जलते हैं। इससे कुम्हारों के कारोबार को पंख लगे हैं।

अब कुम्हार मशीन लगा चुके हैं। गाय के गोबर व मिट्टी के दीये पर्यावरण संरक्षण में जहां सहायक होते हैं, वहीं कुम्हारों की आर्थिकी को संवार रहे हैं। जयसिंहपुर गांव के बृज किशोर प्रजापति बताते हैं कि दीपोत्सव शुरू होने के बाद से उनका पूरा परिवार लगातार दीये बनाने के काम में जुटा है।

इस बार उन्हें एक लाख दीपों का ऑर्डर मिला था, जिसे समय से तैयार कर पहुंचा दिया गया। गांव के ही राजेश प्रजापति को दो लाख दीप बनाने का आर्डर मिला है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर इस काम को पूरा करते हैं। राजेश प्रजापति बताते हैं कि पहले जहां पूरे महीने में मुश्किल से 20 से 25 हजार रुपये की कमाई हो पाती थी, वहीं अब दीपोत्सव के मौसम में ही लाखों रुपये की आमदनी हो जाती है।

बड़े ऑर्डर मिलने से परिवारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल रहा है और युवा पारंपरिक मिट्टी कला से जुड़कर अपना भविष्य संवार रहे हैं। इस बार उन्हें दो लाख दीपों का आर्डर मिला था, जिसे तैयार कर पहुंचा दिया गया।

कुम्हार परिवारों को इलेक्ट्रिक चाक उपलब्ध कराए जाने से दीये बनाने के काम में तेजी आई है। पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल से उत्पादन क्षमता और दीयों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।

जयसिंहपुर, विद्याकुंड और सोहावल के ड्योढ़ी जैसे गांवों में कुम्हार परिवार दीपोत्सव की तैयारियों में जुटे हैं। जिला ग्रामोद्योग अधिकारी राकेश दुबे ने बताया कि 197 कुम्हारों को अब तक इलेक्ट्रिक चाक उपलब्ध कराई जा चुकी है। अब उनकी आर्थिकी बदल रही है।

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