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'टेसू रे टेसू घंटा बजइयो...' नवरात्र से शरद पूर्णिमा तक घर-घर गूंजते हैं टेसू-झेंझी के गीत, सदियों पुरानी है परंपरा

Published: Wed, 21 Oct 2026 12:08 PM (IST)

भारतीय लोक संस्कृति में टेसू-झेंझी की परंपरा का विशेष महत्व है, जो शारदीय नवरात्र से शरद पूर्णिमा तक ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों द्वारा निभाई जाती है।

दुकान पर बिक्री के लिए टेसू सजाकर रखे कुम्हार

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HighLights

  1. टेसू-झेंझी परंपरा नवरात्र से शरद पूर्णिमा तक मनाई जाती है।

  2. बच्चे लोकगीत गाते हुए घर-घर घूमते हैं।

  3. यह भारतीय लोक संस्कृति और विरासत का प्रतीक है।

संवाद सूत्र, औरैया। भारतीय लोक संस्कृति में टेसू-झेंझी की परंपरा का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्र से शरद पूर्णिमा तक ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे टेसू और झेंझी सजाकर घर-घर जाते हैं। इस दौरान बच्चे पारंपरिक लोकगीत गाते हुए लोगों से अनाज और पैसे मांगते हैं। यह परंपरा लोक आस्था, सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानी जाती है।

लोकमान्यताओं के अनुसार, टेसू की कथा महाभारत काल के वीर बर्बरीक से जोड़कर भी सुनाई जाती है। बर्बरीक को घटोत्कच का पुत्र और भीम का पौत्र माना जाता है। हालांकि, टेसू से जुड़ी लोककथाओं के अलग-अलग क्षेत्रीय रूप प्रचलित हैं।

वहीं, झेंझी मिट्टी की छिद्रयुक्त मटकी होती है, जिसमें दीपक जलाकर उसे फूलों और पत्तियों से सजाया जाता है। टेसू को बांस की खपच्चियों से तैयार कर रंग-बिरंगे कपड़ों और फूलों से आकर्षक रूप दिया जाता है।

परंपरा के अनुसार, नवरात्र से शुरू होकर शरद पूर्णिमा तक बच्चे टेसू-झेंझी लेकर घर-घर पहुंचते हैं। कुछ क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा की रात टेसू-झेंझी का विवाह कराने और इसके बाद विसर्जन करने की परंपरा भी प्रचलित है। हालांकि, रीति-रिवाज अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं।

आधुनिकता के दौर में भी ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा बच्चों को लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जोड़ने का माध्यम बनी हुई है। बुजुर्गों का मानना है कि ऐसी परंपराओं को सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है, ताकि भारतीय लोक संस्कृति की पहचान बनी रहे।

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