जागरण संवाददाता, औरैया: जिस पौध को बुढ़ापे के लिए वृक्ष बनाया। उसकी ही छत्रछाया नहीं मिली। क्योंकि, उस वृक्ष ने खुद की छाया से दूर कर दिया। लेकिन, अपने जैसे कई और दुखियारे मिले, तो उनकी पीड़ा में अपना दर्द ही भूल गए। वृद्धाश्रम में जब आत्मीयता का ऐसा मरहम लगा कि हर पुराना जख्म ही नहीं भरा, उन्हें फिर एक परिवार जैसा माहौल मिल गया। यहां पर भारतीय संस्कृति व परंपराएं अभी भी जिदा हैं। पूरे वर्ष के त्योहार व धार्मिक कार्यक्रमों में अनूठा संगम देखने को मिलता है। पराधीन रहने जैसा कुछ भी अहसास नहीं होता है। समाज की एकरूपता अगर देखनी है तो वृद्धा आश्रम के अलावा कोई जगह नहीं है।

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गांव पढ़ीन निवासी 75 वर्षीय उजियारे लाल बताते हैं कि वह दो वर्ष से आश्रम में रह रहे हैं। निराश जिदगी में एक बार फिर जीने की चाहत लौट आई है। एक छोटे से परिवार से निकलकर बड़े परिवार में शामिल हो गए। यहां पर मुझे वह सब कुछ प्राप्त हुआ, जिससे हम वर्षों से अछूते थे।

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गांव पन्हर निवासी 73 वर्षीय भिखारी लाल का कहना है कि उन्हें साढ़े चार साल आश्रम में रहते बीत गए। अब उनका मन वापस जाने का होता ही नहीं है। यहां पर सब कुछ मिलता है। सुबह शाम बगिया को हरा-भरा बनाने में गुजार कर बहुत आनंद मिलता है। हम उम्र के बुजुर्गों के बीच बैठने पर गांव की चौपाल की यादें भी ताजा हो जाती हैं।

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गोविद नगर निवासी 63 वर्षीय राजा बेटी का कहना है बच्चों के ठुकराने के बाद चार साल से आश्रम में रह रही हैं। यहां आकर कभी ऐसा नहीं लगा कि वह अपनों से दूर हैं। यहां पर उन्हें जो माहौल मिला। उसने हमारी जिदगी की पिछली कहानी ही भुला दी। आज उन्हें कई बेटा बेटियों का प्यार यहां पर मिल रहा है।

Edited By: Jagran