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चोटीपुरा गुरुकुल का अनोखा मॉडल: 65 गायों से संवर रही 1200 बेटियों की सेहत और गुरुकुल की अर्थव्यवस्था

Published: Sun, 20 Sep 2026 02:00 AM (IST)

चोटीपुरा स्थित श्रीमद दयानंद कन्या गुरुकुल महाविद्यालय अपनी 65 गायों के पंचगव्य से आत्मनिर्भरता का अनूठा मॉडल प्रस्तुत कर रहा ...और पढ़ें

रजबपुर के गांव चोटीपुरा में स्थित श्रीमद दयानंद कन्या गुरुकुल महाविद्यालय की गोशाला में गायों को चारा खिलातीं प्राचार्य डा. सुमेधा । सौ. गुरुकुल

रजबपुर के गांव चोटीपुरा में स्थित श्रीमद दयानंद कन्या गुरुकुल महाविद्यालय की गोशाला में गायों को चारा खिलातीं प्राचार्य डा. सुमेधा । सौ. गुरुकुल

HighLights

  1. बेटियों को शुद्ध मिल रहा दुग्ध उत्पाद और किसानों को जैविक खाद

आसिफ अली, अमरोहा। भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपरा में पंचगव्य का विशेष महत्व है। दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र से बने पंचगव्य का उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों और विभिन्न संस्कारों में किया जाता है। इसी पंचगव्य को आत्मनिर्भरता का माध्यम बना रहा है रजबरपुर के गांव चोटीपुरा स्थित श्रीमद दयानंद कन्या गुरुकुल महाविद्यालय।

गुरुकुल की गोशाला में पल रहीं 65 गायों से जहां यहां रहने वाली 1,200 छात्राओं के लिए दूध, दही और घी की जरूरत पूरी हो रही है, वहीं गोबर से खाद तैयार कर किसानों को बेची जा रही है। अब गोमूत्र से जीवामृत तैयार करने की भी योजना है।

गांव चोटीपुरा में छह मार्च 1988 को डाॅ. सुमेधा ने श्रीमद दयानंद कन्या गुरुकुल महाविद्यालय की स्थापना की थी। भारतीय संस्कृति और संस्कारों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह गुरुकुल आज बड़े शिक्षण संस्थान के रूप में विकसित हो चुका है।

वर्तमान में यहां करीब 1,200 छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। स्टाफ समेत लगभग 1,300 लोग परिसर में रहते हैं। गुरुकुल की परंपरा के अनुसार स्थापना वर्ष 1988 से ही यहां गोशाला संचालित है। वर्तमान में गोशाला में 65 गाय हैं।

प्राचार्य डाॅ. सुमेधा के अनुसार गायों से मिलने वाले पंचगव्य का उपयोग गुरुकुल में ही किया जा रहा है। प्रतिदिन करीब ढाई से तीन क्विंटल दूध छात्राओं को उपलब्ध कराया जाता है। इससे गुरुकुल को बाजार से दूध, दही और घी खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

गायों के गोबर को बेकार नहीं जाने दिया जाता। गोशाला के पास परिसर में इसके लिए गड्ढे बनाए गए हैं, जहां गोबर से खाद तैयार की जाती है। तैयार खाद को क्षेत्र के किसानों को बेचा जाता है।

इससे किसानों को जैविक खाद उपलब्ध होने के साथ ही गुरुकुल को भी आर्थिक लाभ मिल रहा है। गुरुकुल प्रबंधन अब गोमूत्र के उपयोग की दिशा में भी काम कर रहा है। गोमूत्र से जीवामृत तैयार करने की योजना बनाई गई है।

प्रबंधन का कहना है कि इससे गुरुकुल को लाभ मिलने के साथ किसानों को भी प्राकृतिक खेती के लिए उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराई जा सकेगी। गुरुकुल में गोदान की परंपरा भी निभाई जाती है।

गोशाला में गायों की देखभाल के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। गर्मी से बचाव के लिए पंखे लगाए गए हैं और गायों के लिए गद्दों की भी व्यवस्था है। इनकी नियमित रूप से सफाई की जाती है। प्राचार्य डाॅ. सुमेधा स्वयं प्रतिदिन गायों को चारा खिलाती हैं।

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