अब बिना सुई चुभाए होगी डायबिटीज की पहचान, RGIPT के शोधकर्ताओं ने जलकुंभी से बनाया इको-फ्रेंडली सेंसर
आरजीआईपीटी के शोधकर्ताओं ने जलकुंभी से एक कम लागत वाला, बायोडिग्रेडेबल सेंसर विकसित किया है जो सांस में मौजूद नमी ...और पढ़ें

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HighLights
आरजीआईपीटी ने जलकुंभी से बायोडिग्रेडेबल सेंसर विकसित किया।
यह सेंसर सांस की नमी से मधुमेह का पता लगाता है।
कम लागत वाला, पोर्टेबल मधुमेह निगरानी उपकरण बनाने में सहायक।
संवाद सूत्र, अमेठी। राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी (आरजीआईपीटी) के शोधकर्ताओं ने जलकुंभी जैसी अनुपयोगी और पर्यावरण के लिए समस्या पैदा करने वाली जलीय वनस्पति से कम लागत वाला, बायोडिग्रेडेबल सेंसर विकसित किया है।
यह सांस में मौजूद नमी से जुड़े विद्युत संकेतों के बदलाव के आधार पर डायबिटिक और गैर-डायबिटिक व्यक्तियों के बीच अंतर कर सकता है। शोध का नेतृत्व डॉ. देवाशिस पांडा ने किया। संकल्पना से लेकर प्रयोगात्मक निष्पादन तक का काम साथी डॉ. अभिषेक सिंह की प्रयोगशालाओं में हुआ। आकाश चौरसिया, आयुष सिंह और उत्सव मिश्रा ने प्रयोगात्मक एवं तकनीकी योगदान दिया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, सेंसर महज 0.5 वोल्ट के आपरेटिंग वोल्टेज पर काम करता है। इसका प्रतिक्रिया समय 0.25 सेकंड और पुनर्प्राप्ति समय 0.5 सेकंड दर्ज किया गया। यह मुंह और नाक से निकलने वाली सांस को भी प्रभावी ढंग से पहचान सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तकनीक भविष्य में कम लागत वाले, पोर्टेबल और पर्यावरण-अनुकूल डायबिटीज मानिटरिंग उपकरणों के विकास में उपयोगी हो सकती है। जलकुंभी जैसे बॉयोवेस्ट का मूल्यवर्धन और सतत इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भी इस शोध को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सांस के विश्लेषण से स्वास्थ्य निगरानी की दिशा में यह नवाचार नई संभावनाएं खोल सकता है।
