अंबेडकरनगर: आजाद भारत के पहले चुनाव से लेकर अबतक लोकतंत्र के महापर्व का उल्लास लगातार बढ़ा है। मतपत्र से चला मतदान आज मशीन तक पहुंच गया है। निरक्षरता का अंधकार छंटने से साक्षरता ने मतदाताओं को जागरूक किया है। इससे मतदान भी नया रूप अख्तियार करता गया है। चुनाव की बदलती रंगतों को जेहन में समेटे सैकड़ों मतदाता अब फिर लोकतंत्र के उत्सव में सहभागी बनने वाले हैं। धुंधली यादों से पर्दा हटाते हुए बुजुर्गों ने कहा, हमने आजाद भारत में पहली बार वोट डाल था। मुसीबतों भरी जिदगी से उबरते हुए भारत का विकास देखा है। आज बहुत कुछ बदल गया है।

विधानसभा क्षेत्र कटेहरी के सिलावट गांव में जीवन के 103 साल पूरा कर चुकीं दुरपत्ती देवी ने यादों को टटोलते हुए कहा, पहले के नेताओं में अपनापन झलकता था। वे सब हालचाल लेने और दुख-दर्द दूर करने वाले होते थे। अब तो वोट मांगने वाले बहरूपिया आते हैं। आजादी से पहले जिदगी बहुत खराब थी। दो वक्त के भोजन को लेकर सोचना पड़ता था। देश आजाद हुआ तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। आजाद भारत में हमने पहली बार वोट डाला तो लगा सबकुछ मिल गया। तब से आज तक सभी चुनाव में वोट देने जरूर जाती हूं। बूढ़ी होने पर बच्चों के साथ जाना पड़ता है। पहले के चुनाव में घरों में खुशियां दिखने लगती थीं। कई दिन पहले से वोट डालने की तैयारी होती थी। अब तो वह उत्साह लोगों में देखने को नहीं मिलता। गांवों में नेताओं की पैदल भीड़ से धूल का गुबार उठता था। बच्चे टोपी-बिल्ला लूटने के लिए पीछे दौड़ते थे। अब तो बच्चों के लिए चुनाव में कुछ नहीं है।तब नेता गांव की समस्या भी देखते थे। वक्त बदला तो नेता गाड़ियों में आने लगे। इन्हें गांव की समस्या दिखनी बंद हो गई। अब तो हालचाल छोड़िए वोट ही मांगने कोई नहीं आता है। पहले मतपत्र हाथ में लेकर वोट डालने जाते थे, अब तो मशीन पर वोट डालते हैं। इससे बहुत आसानी होने लगी है। इसबार भी वोट जरूर दूंगी। कटेहरी विधानसभा क्षेत्र के सारंगपुर गांव में 105 साल की बऊखा देवी बोलीं, हमने आजादी से पहले और बाद की जिदगी देखी है। भारत की आजादी के बाद चहुंओर खुशियां झलकने लगी थीं। पहली बार हुए चुनाव में वोट डालने का जब मौका मिला तो कई दिन पहले से तैयारी होने लगी। जिस दिन वोट डाला, उस दिन घर में बहुत खुशी थी। अब अपनी सरकार बनेगी। इसके बाद से बहुत विकास हुआ है। पहले पैदल ही जाना होता था। सड़क और साधन नहीं थे। बिजली, पानी, सड़क मिलने से जीवन काफी सरल हुआ है। पहले नेता जनता का सुख-दुख जानते थे। जनता के फायदे के लिए रकम खर्च करते थे। तब उतनी आमदनी भी नहीं होती थी। अब तो नेता देखने को नहीं मिलते हैं। पहले के नेता लोगों को चेहरे और नाम से पहचानते थे। अब तो सिर्फ हाथ जोड़कर निकल जाते हैं। हमारी तकलीफ सुनना तो दूर, हमें देखते भी नहीं। चुनाव भी बहुत बदल गया है, लेकिन हमने वोट डालना कभी नहीं छोड़ा। अबकी बार भी वोट देने को तैयार हूं।

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