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Ambedkar Nagar Seat: बदले समीकरणों के बीच रोचक होगा मुकाबला, यहां तो राम मंदिर का मुद्दा भी नहीं रहा प्रभावी

बदले समीकरणों के बीच इस बार यहां रोचक जंग के आसार हैं। भाजपा ने बसपा छोड़कर आए सांसद रितेश पांडेय को अपना प्रत्याशी बनाया है। सपा ने लालजी वर्मा तो बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी कमर हयात को मैदान में उतारा है। तीन दशक पहले अयोध्या से अलग होकर अस्तित्व में आए अंबेडकरनगर के मतदाता अपनी ही धुन में जनादेश देते रहे।

By Jagran News Edited By: Aysha Sheikh Published: Wed, 22 May 2024 10:30 AM (IST)Updated: Wed, 22 May 2024 10:34 AM (IST)
Ambedkar Nagar Seat: बदले समीकरणों के बीच रोचक होगा मुकाबला, यहां तो राम मंदिर का मुद्दा भी नहीं रहा प्रभावी

अभिषेक मालवीय, अंबेडकरनगर। धर्मनगरी अयोध्या का अभिन्न अंग रहने के बाद भी अंबेडकरनगर का जनादेश बिल्कुल अलग रहा। तीन दशक पहले अयोध्या से अलग होकर अस्तित्व में आए अंबेडकरनगर के मतदाता अपनी ही धुन में जनादेश देते रहे। देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला मंदिर मुद्दा भी यहां कभी प्रभावी नहीं रहा। अभिषेक मालवीय की रिपोर्ट...

बदले समीकरणों के बीच इस बार यहां रोचक जंग के आसार हैं। भाजपा ने बसपा छोड़कर आए सांसद रितेश पांडेय को अपना प्रत्याशी बनाया है। सपा ने लालजी वर्मा तो बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी कमर हयात को मैदान में उतारा है। अगर अतीत पर नजर डालें तो देश की आजादी के बाद फैजाबाद पूर्व नाम की लोकसभा पर 1952, 1957 व वर्ष 1962 में अकबरपुर सुरक्षित सीट पर हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को जीत मिली थी। 1967 में रिपब्लिकन पार्टी के रामजी राम सांसद चुने गए थे।

1971 में उन्होंने कांग्रेस से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। 1977 के में भारतीय लोकदल के मंगलदेव विशारद ने यहां अब तक की सबसे बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस के रामजी राम को पराजित किया। 1984 में यहां अंतिम बार कांग्रेस के रामप्यारे सुमन सांसद चुने गए थे। 1989 और 1991 में जनता दल के उम्मीदवार राम अवध सांसद चुने गए थे। इसी बीच बसपा और भाजपा भी चुनावी मैदान में उतर चुकी थी और राम मंदिर को लेकर आंदोलन भी शुरू हो गया था।

जनपद गठन से बसपा को मिला जनाधार

1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने फैजाबाद (वर्तमान में अयोध्या) जनपद की अकबरपुर और टांडा तहसील को जोड़कर अंबेडकरनगर जनपद गठन की घोषणा की। बसपा को इसका लाभ भी 1996 के लोकसभा चुनाव में मिला। बसपा से घनश्याम चंद्र खरवार पहले सांसद चुने गए। अब जातिगत समीकरण प्रभावी होने लगे। 1996 से 2004 तक तीन बार मायावती खुद चुनावी मैदान में उतरीं और जीतीं।

दो बार उन्होंने कार्यकाल के बीच में ही संसद की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। इस दौरान उपचुनाव में 2002 में बसपा के त्रिभुवन दत्त व 2004 में सपा के शंखलाल माझी सांसद बने। 2009 में लोकसभा चुनाव से पहले संसदीय क्षेत्र का परिसीमन हुआ। यहां की आलापुर सुरक्षित विस सीट को हटाकर अयोध्या के गोसाईगंज विस क्षेत्र को शामिल कर दिया। इसके बाद भाजपा के वोटों का ग्राफ जरूर बढ़ा, लेकिन बसपा की जीत का क्रम बरकरार रहा।

मोदी लहर में भाजपा को मिली थी पहली जीत

2014 में मोदी लहर में भाजपा प्रत्याशी डा. हरिओम पांडेय ने साढ़े चार लाख से अधिक मत हासिल किए। उन्होंने बसपा के राकेश पांडेय को एक लाख 23 हजार से अधिक मतों से पराजित किया। हालांकि 2019 में बसपा ने फिर जीत हासिल की। यह चुनाव बसपा ने सपा गठबंधन के साथ लड़ा था। इस चुनाव में भी जातिगत समीकरण हावी रहा था। भाजपा से प्रदेश सरकार में मंत्री रहे मुकुट बिहारी वर्मा को चुनावी मैदान में उतारा था। उन्होंने पिछड़ी जाति के साथ सवर्ण का साथ जरूर मिला, लेकिन वह जीत नहीं दर्ज कर सके।

विनय कटियार भी यहां कर चुके हार का सामना

अंबेडकरनगर संसदीय सीट पर 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने फायर ब्रांड नेता व राम मंदिर आंदोलन से जुड़े विनय कटियार को मैदान में उतारा था। उन्हें 2,26,067 मत मिले, लेकिन वह तीसरे स्थान पर रहे। इस चुनाव में जीत को सेहरा बंधा बसपा के राकेश पांडेय के सिर, वह सांसद चुने गए। वहीं, सपा के शंखलाल माझी को 2,36,751 मत मिले थे।


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