इलाहाबाद (जेएनएन)। यूपीपीएससी में सदस्यों के रिक्त पदों पर नई नियुक्ति अब तक न होने से बड़ी परीक्षाओं और परिणाम में निष्पक्षता संदिग्ध हो गई है। सभी निर्णय उन्हीं की ओर से एकतरफा लिए जा रहे हैं जिन पर परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक होने, भर्तियों की सीबीआइ जांच का भरपूर विरोध करने और सबसे अहम यह कि लाखों अभ्यर्थियों का विश्वास खो देने के गंभीर आरोप लगे। यह स्थिति तब है जब यूपीपीएससी की परीक्षाओं और परिणाम के लिहाज से सितंबर माह खास हो गया है, जबकि 30 तारीख को एक और सदस्य देवी प्रसाद द्विवेदी के सेवानिवृत्त होने के बाद परिस्थितियां प्रतिकूल हो सकती हैं।

यूपीपीएससी में चेयरमैन अनिरुद्ध सिंह के कार्यकाल में पेपर लीक होने की दो घटनाएं हो चुकी हैं। समीक्षा अधिकारी परीक्षा 2016 में साक्ष्य देने के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं की, पीसीएस परीक्षा 2017 की मुख्य परीक्षा में प्रश्न पत्र गलत बंटे और हजारों अभ्यर्थियों को इसका भारी विरोध करना पड़ा, एलटी ग्रेड शिक्षक भर्ती 2018 में पेपर लीक होने के आरोप लगे, परीक्षाओं की गुणवत्ता में सुधार की बजाए भर्तियों की सीबीआइ जांच रुकवाने में टीम ने पूरा जोर लगाया, यूपीपीएससी में परिणाम/कार्य प्रभावित होने में गुटबाजी की चर्चा उठी।

इसके अलावा कई अभ्यर्थियों की ओर से चेयरमैन अनिरुद्ध सिंह यादव की डिग्री और नियुक्ति पर ही सवाल उठाए गए। परिणामों को भी लंबित रखने में यूपीपीएससी पर धरना प्रदर्शन हुआ। किसी भी परीक्षा संस्था में परीक्षाओं के कार्यक्रम और परिणाम पर चेयरमैन व सभी सदस्यों के बीच विचार विमर्श के बाद ही निर्णय लिए जाते हैं लेकिन, सदस्यों के लगातार रिक्त हो रहे पदों पर नियुक्ति में लेटलतीफी से निर्णय उन्हीं की मनमानी पर आश्रित हो गए हैं जो आरोपों के घेरे में हैं। 

Posted By: Ashish Mishra

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