प्रयागराज, जेएनएन। महिलाओं के हक के लिए मेजा के हरदिहा गांव की रहने वाली सुभावती देवी ने जंग छेड़ रखी है। कहीं पर महिला पर कोई अत्याचार होता है तो सुभावती व उनकी समूह की सदस्य वहां पहुंच जाती हैं। महिला को इंसाफ दिलाने तक उनकी लड़ाई चलती है। महिलाओं के हक के लिए आवाज उठाना सुभावती के जीवन का मकसद बन गया है।

सुभावती के पति और ससुर बंधुआ मजदूरी करते थे

मूलरूप से कोरांव विकास खंड के भगेसर गांव की रहने वाली सुभावती देवी की शादी 2004 में हरदिहा के बबलेश आदिवासी से हुई। सुभावती जब ससुराल आईं तो उन्हें पता चला कि उसके पति और ससुर दोनों अभी तक बंधुआ मजदूरी करते हैं। सुभावती इंटर पास थीं। उन्हें यह बात चुभने लगी कि उनका पति बंधुआ मजदूर है। उन्होंने अपने पति को पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे कर्ज चुकता करके पति और ससुर को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया। उसके बाद खुद भी स्नातक की पढ़ाई शुरू की।

कानूनी दावपेंच की जरूरत पड़ी तो एलएलबी करने लगीं

इसके बाद सुभावती ने प्रगति वाहिनी संस्था से जुड़कर आदिवासी महिलाओं को संगठित करना शुरू किया। महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए जागरूक करने लगीं। इस लड़ाई में कानूनी दावपेंच की जरूरत पड़ी तो उन्होंने कानून की पढ़ाई करने की ठान ली। अभी वह महात्मा डिग्री कालेज गडार मेजा से एलएलबी कर रही हैं। कानूनी सहायता केंद्र के माध्यम से महिलाओं को कानूनी सलाह भी दे रही हैं। अभी उनकी एलएलबी द्वितीय वर्ष की पढ़ाई चल रही है।

किसी महिला पर अत्याचार होता है तो सुभावती वहां पहुंच जाती हैं

नयीगढ़ी की रहने वाली संगीता बताती हैं कि आदिवासी महिलाओं का अक्सर शोषण होता है लेकिन अब कहीं पर किसी महिला पर अत्याचार होता है तो सुभावती वहां पहुंच जाती हैं। राजगढ़ की वंदना देवी बताती हैं कि जब से आदिवासी महिलाओं का समूह बना है, तब से समाज में उनकी इज्जत भी बढ़ गई है।

बोलीं सुभावती देवी

सुभावती देवी कहती हैं कि मैंने बचपन से संघर्ष किया है। शादी होने के बाद जब अपने पति और ससुर को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया तो मेरा हौसला बढ़ा। जब महिलाओं के हक की लड़ाई लडऩी शुरू की तो कानूनी पेच सामने आए। इसलिए एलएलबी की पढ़ाई शुरू कर दी है। मुझे जरूरतमंद महिलाओं की मदद करके बहुत खुशी मिलती है।

 

Posted By: Brijesh Srivastava

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