कुंभनगर [सद्गुरु शरण]। कुंभ नया है, न सियासत और न संगम, पर प्रयागराज में यह तीनों चेहरे नए हैं। सियासत ने कुंभ को दिव्य-भव्य बनाने का अनुष्ठान रचा, तो इससे उसका खुद का भी कायाकल्प हुआ।

अनगिनत कुंभ मेलों का साक्षी संगम यह नया परिदृश्य देखकर गद् गद् है... सियासत के कंधों पर कुंभ, और कुंभ के चरणों में सियासत। संगम से लेकर अक्षयवट और इनके करोड़ों श्रद्धालुओं का आशीष पाने की सियासी बेचैनी पर कम से कम कुंभनगर में किसी को कोई एतराज नहीं। संगम पर दिव्य-भव्य कुंभ सजाने के लिए यह वरदान उसका अधिकार बन चुका है। यहां अमावस पर मौन की गूंज में समाज के लिए सार्थक सियासत का उद्घोष भी है।

धार्मिक-आध्यात्मिक परंपरा और संवैधानिक बाध्यतावश कुंभ और लोकसभा चुनाव के बीच सिर्फ कुछ हफ्तों के अंतराल का अपिरहार्य संयोग टाला नहीं जा सकता, पर यह कुंभ इतिहास में इस सच्चाई का साक्षी रहेगा कि सियासत जैसी घोर नकारात्मक बन चुकी जनधारणा जब कुंभ जैसे किसी पवित्र आयोजन को दिव्य-भव्य बनाने का अनुष्ठान करती है तो उसका अपना चेहरा भी किस तरह दिव्य-भव्य हो जाता है।

सदियों बाद कैद से मुक्त हुए अक्षयवट का आशीष करोड़ों श्रद्धालुओं पर बरस रहा है, पर सबसे अधिक शायद सियासत पर, जिसकी इच्छाशक्ति ने उसके और श्रद्धालुओं के बीच खड़ी बाधाएं हटा दीं। सोनभद्र के श्रीकांत दुबे पिछले कई कुंभों से अपनी माताजी को कल्पवास करवाने आते हैं।

इस बार भी आए हैं, पर उन्हें यकीन नहीं होता कि यह वही कुंभ है। वह कहते हैं कि यह सब यदि चुनाव की खातिर किया गया तो हर कुंभ के बाद चुनाव होना चाहिए। हर्ज क्या है? वह फिर सवाल करते हैं कि चुनाव तो पहले भी होते रहे। अब तक किसी सरकार या नेता ने ऐसा कुंभ क्यों नहीं करवाया? जाहिर है कि ज्यादातर बाकी श्रद्धालुओं की तरह श्रीकांत दुबे यह बात हजम नहीं कर पा रहे कि मोदी-योगी ने सिर्फ वोटों की खातिर कुंभ को दिव्य-भव्य बनाया।

कुंभनगर में प्रवेश से पहले प्रयागराज की मोहक छवि और सजे-धजे चौराहों पर बैरीकेडिंग के पीछे मुस्कुराकर रास्ता बताते पुलिसकर्मी सिर्फ चौंकाते नहीं, बल्कि संदेश भी देते हैं कि सरकार ठान ले तो क्या कर सकती है। वास्तव में कुंभ और इससे जुड़ी सियासत का सबसे दमदार एवं सार्थक संदेश यही है। पहले भी कुंभ मेलों में शाकाहारी-सदाचारी पुलिसकर्मी तैनात करने की नीति रही है, पर इसका साकार रूप इस बार दिख रहा है। सुरक्षाकर्मियों के हाथ में डंडे-बंदूकें भी हैं, पर उनके चेहरों पर सिर्फ अपनत्व लुटाती मुस्कुराहट। पुलिसकर्मी अपने व्यवहार से कुंभ की सुविधा-सकारात्मकता का विस्तार कर रहे हैं। वाकई, कुंभ में पुलिस का भी नया चेहरा दिख रहा है।

स्थानीय ट्रिपलआइटी के छात्र-छात्राओं की टोली कुंभ की छटा देखकर मुग्ध है। ये सब पहली बार कुंभ मेला में आए हैं। जाहिर है, उन्हें पिछले मेलों का अनुभव नहीं, पर मौजूदा इंतजाम देखकर छात्रा नेहा सवाल करती है कि जो मशीनरी कुंभ में यह सब कर सकती है, वह हमेशा इसी तरह काम क्यों नहीं करती? एक छात्र आरिफ पूछता है कि पुलिसकर्मी हमेशा इस तरह क्यों नहीं मुस्कुराते? अखिलेश यादव किसी दिन संगम पर डुबकी लगाने जरूर आए, यद्यपि सभी दलों के नेता कुंभ आकर देख सकते हैं कि उनके वोटबैंक संगम पर किस तरह विलुप्त हो जाते हैं। यहां श्रद्धालु जाति, क्षेत्र, बोली और विचार का भेद भूलकर एकमन हो जाते हैं।

कुंभ जैसे आयोजन और उसमें समाज-सरकार की भागीदारी का यह बेहद उज्ज्वल पक्ष है। संगम पर सब एक-दूसरे को सहारा दे रहे हैं क्योंकि यहां हर कोई सिर्फ श्रद्धालु है और सबका एक ही मंतव्य है...पवित्र त्रिवेणी में एक पुण्य डुबकी।

Posted By: Dharmendra Pandey

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