जागरण संवाददाता, प्रयागराज : संगम तीरे माहभर से चल रहा कल्पवास माघी पूर्णिमा स्नान पर्व से समाप्त हो जाएगा। पौष पूर्णिमा से रेती पर भजन, पूजन करने वाले गृहस्थ शनिवार को संगम में पुण्य की डुबकी लगाकर लौट जाएंगे। लौटते समय साथ ले जाएंगे संतों से मिले धार्मिक संस्कार, दीक्षा व संगमनगरी में बिताए पल के सुनहरे संस्मरण। कल्पवासियों के साथ संत-महात्मा भी अपने मठ-मंदिर रवाना हो जाएंगे। अधिकतर महात्मा यहां से वृंदावन व हरिद्वार जाएंगे।

कोरोना संक्रमण के कारण माघ मेला को लेकर संशय की स्थिति बनी थी। लेकिन, प्रशासन ने नियमानुसार मेला को बसाया। संत व गृहस्थों ने परंपरा के अनुरूप कल्पवास किया। अब उसकी विदाई की बेला आ गई है। संतों व कल्पवासियों का शिविर शुक्रवार से उखड़ने लगे। सगे-संबंधी सामान समेटने में जुटे रहे। प्रसाद स्वरूप उनके साथ साथ लाया गया तुलसी का पौधा व जौ का पौधा होगा। जौ को कल्पवास आरंभ करते समय शिविर के बाहर बोया था, जो पौधा के रूप में उनके साथ जाएगा। जौ के पौधे को पूजा घर, तिजोरी व अन्य पवित्र स्थल पर रखेंगे।

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दोपहर 12.24 बजे तक स्नान का विशेष मुहूर्त

ज्योतिर्विद आचार्य देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी बताते हैं कि पूर्णिमा तिथि शुक्रवार की दोपहर 2.53 बजे लगकर शनिवार की दोपहर 1.51 बजे तक रहेगी। दिन मघा नक्षत्र शनिवार की दोपहर 12.24 बजे तक है। स्नान का विशेष योग मघा नक्षत्र के रहने के दौरान है। मकर राशि में वृहस्पति, बुध व शनि का संचरण होने से त्रिग्रहीय योग का संयोग बन रहा है।

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शनिवार होना कल्याणकारी

पराशर ज्योतिष संस्थान के निदेशक आचार्य विद्याकांत पांडेय के अनुसार किसी अनुष्ठान का आरंभ अथवा समापन मंगलवार व शनिवार के दिन होना शुभ होता है। अबकी कल्पवास शनिवार को खत्म हो रहा है। यह हर कल्पवासियों के लिए कल्याणकारी है।

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Edited By: Jagran