प्रयागराज, जेएनएन। माघ मेले में एक महीने तक स्नान-दान करने के बाद अब कल्पवासी अपने-अपने घर लौटने लगे हैं। कल्पवास कर रहे साथियों से बिछडऩे का उनमें गम भी दिखा। एक-दूसरे से फिर मिलने का वादा कर बालू का प्रसाद लेकर कल्पवासी माघ पूर्णिमा स्नान के बाद अपने-अपने घरों के लिए लौट रहे हैं। 

शिविरों में रह रहे लोगों के बीच एक पारिवारिक माहौल बना

माघी पूर्णिमा स्नान पर्व संपन्न होने के साथ कल्पवास का समापन भी हो जाता है। ऐसे में कोई पूजा पाठ करता है तो कोई 12 साल के कल्पवास का संकल्प पूरा होने पर सजिया दान करता है। इसकी प्रक्रिया शिविरों में संपन्न हो चुकी है। एक माह की अवधि में कल्पवासियों के बीच धर्म-कर्म की बातें हुईं। अन्य शिविरों में रह रहे लोगों के बीच एक पारिवारिक माहौल बना। उनमें अपनापन नजर आया। अब विदाई की बेला आ गई तो कल्पवासियों में एक-दूसरे से बिछड़ जाने की बात सोचकर बेचैन हो उठे। 

अगले वर्ष कोई ठिकाना नहीं, कौन कहां मिलेगा

काली मार्ग पर लगे शिविरों में भी कुछ ऐसा ही माहौल दिखा। माघी पूर्णिमा स्नान होने के बाद सभी अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे हैं। सामानों की पैकिंग तो दो दिन पूर्व से ही शुरू हो गई थी। शिविर में बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ले रहे सियाराम, लवकुश मिश्रा, रामबाबू पांडेय, श्रीधर चतुर्वेदी और ज्ञान प्रकाश मिश्रा ने कहा कि एक महीने तक साथ रहे, खूब बातें हुईं। भंडारे में साथ काम किया। संतों को खाना परोसा। एक दूसरे के रिश्तेदार आए तो उनसे भी परिवार जैसी बातें हुईं। अब एक साल बाद माघ मेला आएगा तो कोई ठिकाना नहीं, कौन कहां मिलेगा। इसलिए मन भारी हो रहा है।

 

Posted By: Brijesh Srivastava

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