विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 27, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

हिंदी साहित्य सम्मेलन का सिकुड़ रहा दायरा, जानें क्या है कारण

By Brijesh SrivastavaEdited By:
Published: Mon, 27 May 2019 12:30 PM (IST)

हिंदी साहित्य सम्मेलन की साख कम होती जा रही है। देश-विदेश में खुले केंद्र तेजी से बंद हो रहे हैं।परीक्षार्थियों की संख्या में भी गिरावट आ रही है।

हिंदी साहित्य सम्मेलन का सिकुड़ रहा दायरा, जानें क्या है कारण
हिंदी साहित्य सम्मेलन का सिकुड़ रहा दायरा, जानें क्या है कारण

प्रयागराज, [शरद द्विवेदी]। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देशवासियों को एकजुट करने के उद्देश्य से स्थापित हिंदी साहित्य सम्मेलन का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। सम्मेलन में हिंदी के पाठकों की संख्या भी निरंतर घट रही है। देश-विदेश में खुले सम्मेलन के केंद्र लगातार बंद हो रहे हैं। उपाधि के लिए कराई जाने वाली सम्मेलन की परीक्षा में भी कोई शामिल नहीं होना चाहता है। इसकी गतिविधियां भी कम हो गई हैं। अब साल में एक बार गैर हिंदी भाषी प्रदेश में अधिवेशन व कुछ मौकों पर गोष्ठियां कराना ही सम्मेलन की मुख्य गतिविधि बन गई है। 

 महामना मालवीय सम्मेलन के पहले अध्यक्ष व राजर्षि टंडन पहले महामंत्री थे

भारतवासियों में संवाद स्थापित करने के लिए दस अक्टूबर 1910 में वाराणसी में हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की गई। महामना पं. मदन मोहन मालवीय सम्मेलन के पहले अध्यक्ष व राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन पहले महामंत्री बने। एक साल बाद 1911 में सम्मेलन प्रयागराज में स्थापित हो गया। देश को आजादी मिलने के बाद भारत में 1300 से अधिक केंद्र बने। विदेश में मारीशस व फिजी में भी केंद्र खोले गए। सम्मेलन से एक साल का प्रथमा, दो साल का मध्यमा (साहित्य विशारद) व तीन साल का उत्तमा (साहित्य रत्न) के साथ महा महोपाध्याय की उपाधि लेने की लोगों में होड़ रहती थी। 

1948 से 1971 तक केंद्र सरकार के अधीन रहा, कम हुआ सम्मेलन का प्रभाव

सम्मेलन 1948 से 1971 तक केंद्र सरकार के अधीन रहा। इस दौरान उसका प्रभाव कम होता गया। फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकारी अधिग्रहण निरस्त कर दिया गया, लेकिन सम्मेलन की दशा में सुधार के बजाय गिरावट आती गई। मौजूदा समय देश में सौ के लगभग केंद्र ही बचे हैं। विदेश में सिर्फ मारीशस में ही केंद्र चल रहा है। 

सम्मेलन का रहा है राजभाषा का दर्जा दिलाने में योगदान 

ङ्क्षहदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में हिंदी साहित्य सम्मेलन का अहम योगदान है। देश को आजादी मिलने से पहले कराची में क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में अधिवेशन हुआ था। इसमें हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने का खाका तैयार हुआ। देश को आजादी मिलने के बाद संविधान सभा बनाने के लिए प्रमुख लोगों की विधानसभा बैठी तो उसमें पुरुषोत्तम दास टंडन, क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय ने ङ्क्षहदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने पर मुहर लगवाई। 

विशारद थी विभूतियां 

हिंदी साहित्य सम्मेलन से पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव, जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह जैसी विभूतियों ने विशारद की उपाधि ग्रहण किया था। 

महात्मा गांधी थे सभापति

हिंदी साहित्य सम्मेलन के पहले सभापति महामना मदन मोहन मालवीय थे। महात्मा गांधी दो बार सभापति रहे। इनके अलावा प्रथम राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पुरुषोत्तम दास टंडन, माधवराव सप्रे, गणेश शंकर विद्यार्थी, राहुल सांकृत्यायन जैसी विभूतियां सभापति रही हैं। 

हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री की वेदना

हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री विभूति मिश्र कहते हैं कि कभी सम्मेलन की उपाधि पाना हर किसी के लिए गर्व की अनुभूति कराता था। वहीं आज के दौर में हर कोई रोजगारपरक डिग्री की ओर भाग रहा है। इसके चलते इसका दायरा कम हो रहा है। 

डॉ. प्रभात की जयंती पर आयोजन 

हिंदी साहित्य सम्मेलन के उन्नायक डॉ. प्रभात शास्त्री की 101वीं जयंती आज मनाई जा रही है। इस दौरान संस्कृत साहित्य में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए डॉ. त्रिवेणी प्रसाद शुक्ल व प्रो. आनंद कुमार श्रीवास्तव (वाराणसी), डॉ. राममुनि पांडेय (प्रयागराज) व प्रो. मुरली मनोहर पाठक (गोरखपुर) को सम्मानित किया जाएगा।  

लोकसभा चुनाव और क्रिकेट से संबंधित अपडेट पाने के लिए डाउनलोड करें जागरण एप

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।