प्रयागराज, [राकेश पांडेय]। 'त्रिवेणीं माधवं सोमं, भरद्वाजं च वासुकिम्, वंदे अक्षयवटं शेषं, प्रयागं तीर्थनायकम्'

तीर्थराज प्रयाग के कल्पवास क्षेत्र में ब्रह्म मुहूर्त से गूंजते ऐसे मंत्र कदमों को बरबस जड़वत कर देते हैं। आध्यात्मिक ऊर्जा के इस अनूठे संगम में एक बार डुबकी लगाने वाला इसी रंग में रंग जाता है। यद्यपि कल्पवास उम्र के तीसरे पड़ाव में करने की मान्यता है, पर संगमनगरी का आध्यात्मिक ओज हर वय के लोगों को इतना झंकृत कर देता है कि वह सांसारिकता को कुछ दिनों के लिए त्यागकर एक कल्प यहां बिताना चाहते हैं। बाल्या व युवावस्था से उम्र के अंतिम पड़ाव तक पहुंच चुके तमाम लोग इस बात को लेकर मन मसोसते मिल जाएंगे कि उन्होंने अब तक कल्पवास क्यों नहीं किया?

विवेक कहते हैं कि अगले वर्ष यहां एक माह रुककर भजन-पूजन करूंगा

दिल्ली में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे विवेक शर्मा का भाव कुछ ऐसा ही है। मूलत: बिहार के पटना निवासी विवेक के बाबा राजेश्वर शर्मा व दादी मालती देवी सेक्टर दो में कल्पवास कर रहे थे। तीन दिन संगम तट पर रुककर आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति करने वाले विवेक कहते हैं, 'अगले वर्ष मैं यहां एक माह रुककर भजन-पूजन करूंगा'। 

नियम और संकल्प हैैं यथावत

वक्त के साथ माघ मेले में बहुत कुछ बदला है। पुराणों में वर्णित पर्णकुटियों की जगह स्विस कॉटेज हैैं अब। एक प्रशासनिक अधिकारी बताते हैं कि 'आज जिसका शिविर जितना अधिक सुविधाजनक होता है, उससे उनके रसूख का पता चलता है।' इस बदलाव के बीच भी कल्पवासियों के तप, होम, दान का नियम और संकल्प में परिर्वतन नहीं हुआ। तीर्थपुरोहित पं. रामनाथ वैद्य बताते हैं, 'मैंने 50 साल में मेला क्षेत्र में काफी बदलाव देखा है। आज संत व श्रद्धालु सुविधाभोगी हो गए हैं। इसके बावजूद उनके अंदर खुद के धर्म, संस्कृति से जुडऩे की ललक कायम है।' कल्पवास के पहिया ने माघी पूर्णिमा को विश्राम पा लिया। लेकिन, जन्म और मृत्यु के बीच वर्तमान की बेहतरी, भविष्य के सुख-मोक्ष और अगले जन्म के इस जन्म से बेहतर होने की कामना कल्पचक्र को आगे भी गतिमान बनाती रहेगी...।

कुंभ सदृश्य सुविधाओं का अहसास

कल्पवास का महात्म्य प्राचीनकाल के राजसूय यज्ञ के बराबर माना जाता है।  वैसे, लोकतांत्रिक युग में राजसुख के इच्छुक कल्पवासी नगण्य दिखते हैं। वहीं, राजसत्ता में बैठे लोग स्वयं के पुण्य लाभ के लिए कल्पवासियों के यज्ञ में कोई कमी नहीं छोडऩा चाहते। शायद, इसी कारण अबकी माघ मेले में कुंभ 2019 सदृश्य इंतजाम किया गया। सन 2018 में माघ मेला 720 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला था तो इस बार यह 772 हेक्टेयर में है। कुंभ 2019 का फैलाव 35 सौ हेक्टेयर में था। इस साल मेला छह सेक्टर में बसाया गया, जबकि वर्ष 2018 में पांच सेक्टर थे।

कुंभ पर्व की भांति प्राचीन वृक्ष 'अक्षयवट' के द्वार खोल दिए गए

2019 के 'दिव्य व भव्य कुंभ' के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए संगम मार्ग पर रंगबिरंगे झंडे लगाए गए। करीब 25 हजार शौचालय बने। क्षेत्र को मच्छर-मक्खी मुक्त करने के लिए सफाई पर विशेष जोर रहा। दिन में लार्वा निरोधक का छिड़काव और शाम को फॉगिंग कराई गई। स्नान व अर्घ्‍य के लिए गंगाजल की शुद्धता को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता थी। इसे दर्शाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और जल शक्ति मंत्री डॉ. महेंद्र सिंह ने गंगा जल का पान कर उसकी शुद्धता की प्रामाणिकता देने की कोशिश की। मेला क्षेत्र एलईडी से जगमगा रहा है, जिसने श्रद्धालुओं को आकाशगंगा में स्थित करोड़ों दैदीप्यमान तारों का आभास कराया। श्रद्धालुओं की श्रद्धापूर्ति में कमी न रह जाए, उसके लिए कुंभ पर्व की भांति प्राचीन वृक्ष 'अक्षयवट' के द्वार खोल दिए गए। 

खास-खास

-2020 में 2018 की तुलना में 52 हेक्टेयर अधिक क्षेत्रफल में बसाया गया माघ मेला

-2019 के दिव्य-भव्य कुंभ की तरह एलईडी रोशनी से जगमगा रहा अबकी माघ मेला

-शौचालय निर्माण और मेले में स्वच्छता में दिखी वर्ष 2019 के कुंभ मेले जैसी झलक

-कुंभ मेले में आकर्षण का केंद्र रहे रंग बिरंगे झंडे इस माघ मेले में संगम मार्ग पर लगे।

Posted By: Brijesh Srivastava

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