सुमित शर्मा, अलीगढ़ : पतझड़, सावन, वसंत, बहार। ऋतुओं के यही चक्र सुखद अनुभूति कराते हैं। धरती की तपन और फिर वर्षा में नहाना। इंसान की अठखेलियों संग कभी बर्फ की श्वेत चादर ओढ़ लेना तो कभी वसंत के मोहक रंगों से सज-धजकर खिलखिला जाना। रोजाना सुबह प्रकृति को गले लगाकर मस्ती करना। इस बरस मानो इन रंगों को नजर लग गई। लेकिन, करीब सात माह बाद शहर पटरी पर फिर लौट आया है। पार्कों में गुनगुनी सुबह का सैर-सपाटा अब यही कहता है कि कोरोना... तुझे टाटा।  


बदली बदली सी सुबह

विजयदशमी की अगली सुबह बदली-बदली सी थी। सोमवार को छह बजे का वक्त था। लॉकडाउन में शांत हो चुके रास्ते मुस्कुरा रहे थे। हवा में ताजगी भरी महक थी और मैं शहर घूमने निकल पड़ा था। नौरंगाबाद में मंदिर के पास एक हलवाई की दुकान पर लोग जलेबी खा रहे थे। यहां बातें राजनीति या भविष्य की चिंताअों पर नहीं थी, पर कहीं ना कहीं कोरोना का अलाप छिड़ ही गया। बुजुर्ग काका कहने लगे कि इतिहास साक्षी है कि जो जन्मभूमि त्यागता है, वह सुखी नहीं रह सकता। लोग घरों को भूल गए थे। जब कोरोना ने रंज दिया तो घर ही याद आया। चंद दिनों में रिश्तों की अहमियत समझ में आई। जलेबी खाते हुए बोले, कोरोना तेरा शुक्रिया...। मुंह पर मास्क लगाए उनके साथ बैठे लोग भी हामी भर रहे थे। शायद कोरोना काल ने चर्चाओ की तस्वीर बदल दी है। अड्डों, गली, चौराहों और ट्रेनों के सफर में अब यही चर्चाएं प्रबल हैं...। मैं थोड़ा आगे बढ़ा...। सात बज चुके थे। दुबे के पड़ाव होते हुए रामघाट रोड की तरफ मुड़ गया। इक्का-दुक्का वाहन और कुछ-कुछ दूरी पर सैर करने वालों का झुंड था। पांच-छह लोग दूरी बनाकर चल रहे थे। मैं सेंटर प्वाइंट होते हुए कठपुला की ओर बढ़ गया। यहां कुछ समाजसेवी सड़क किनारे बैठे लोगों को खाने का सामान बांट रहे थे। कुछ देर ठहरकर मैं इन्हें देखने लगा। उनके चेहरों पर ऐसा सुकून था, जैसे किसी बच्चे की बड़ी जिद पूरी हुई हो। मैं यहां से रोडवेज बस स्टैंड के पास गांधी पार्क में पहुंच गया। साढ़े सात बजे पार्क गुलजार था। गोल चक्कर में लोगों ने अपने हिसाब से जगह को बांट रखा था। गेट से सीधे जाते रास्ते पर चबूतरा बना है। यहां कुछ बुजुर्ग बैठकर अनुलोम-विलोम कर रहे थे। कुछ देर टहलते और फिर कसरत में लीन हो जाते। चबूतरे से उतरते ही बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। मोहल्ले में लोगों को क्रिकेट से आपत्ति होती होगी। लेकिन, बुजुर्ग, महिलाएं भी इन्हें देखकर खुश थीं। कभी कभार बॉल भी लग जाती तो मुस्कुराकर लौटा देते। पार्क के पीछे की तरफ कसरत के लिए मशीनें लगी थीं। इसे लोग अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रहे थे। कोई साइकिल चला रहा था तो कोई पैडल एक्सरसाइज में व्यस्त था। कुछ बच्चे दौड़ लगा रहे थे। हर बेंच पर कोई ना कोई बैठकर ऊर्जा भर रहा था। 

15 साल से कर रहे योगा, कोरोना भी ना रोक पाया 

जयगंज निवासी कारोबारी मुकेश जैन चादर बिछाकर अपने दोस्तों के साथ योगा कर रहे थे। कहने लगे कि 15 साल से योगा कर रहे हैं। पहले नकवी पार्क में जाते थे। कोरोना काल में सब बंद हो गया तो घर की छत पर ही योगा किया। अब करीब महीने भर में आने लगे हैं। उन्होंने पार्क की अव्यवस्था पर भी नाराजगी जताई है। कहने लगे कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सुविधाएं नहीं मिल पातीं। इसकी शिकायत भी करूंगा। उनके साथ आए हिमांशु जिंदल बोले... कोरोना अब सामान्य बुखार की तरह हो गया है। जितना डरो, उतना डर लगेगा। अब चीजें बदल गईं हैं। पास ही योगा कर रहे मुरारी लाल ने उनका समर्थन करते हुए कहा कि ताजी आबो-हवा के आगे कुछ नहीं है। प्रकृति की यही तो खूबसूरती है, जहां कोरोना भटक भी नहीं सकता...। 

सलीका सीख गए लोग 

कोरोना काल ने शहर को एक और बड़ा फायदा दिया है। लोग नियमों को मानने लगे हैं। सुबह करीब नौ बजे कंपनी बाग चौराहे पर अॉटो तरीके से खड़े थे। बिना मास्क के लोगों को बिठाने में शायद उन्हें भी आपत्ति हो रही थी। पुलिसकर्मी विशेष ख्याल रख रहे थे कि कोई भीड़ ना इकट्ठा हो। दुबे के पड़ाव चौराहे पर लगीं ट्रैफिक लाइटों को देखकर लोग रुक गए थे। जब तक पुलिसकर्मी ने जाने की इजाजत नहीं दी, तब तक सलीके से लोग ऐसे ही डटे रहे। कुछ हद तक शारीरिक दूरी का उल्लंघन हो रहा था। लेकिन, व्यवस्थित यातायात ने इसे ढंक दिया। निष्कर्ष यही कि लोगों में कोरोना को डर तो नहीं बचा, मगर जागरूकता जरूर बढ़ी है। कोरोना काल की यही सबसे अच्छी उपलब्धि मानी जा सकती है...।

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