अलीगढ़ : मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी ने कमिश्नरी सभागार में विभागों के जन सूचना अधिकारी व प्रथम अपीलीय अधिकारियों की क्लास लगाई। पांच घंटे तक चले प्रशिक्षण में उन्होंने कहा कि अब अफसर जन सूचना अधिकार का जवाब नहीं देने की बात भूल जाएं। सिर्फ एक्ट के आधार पर ही जवाब नहीं दिया जा सकता है।

मुख्य सूचना आयुक्त ने कहा कि शासन ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए जन सूचना अधिकार की शुरुआत की है। 2015 के बाद इसे ज्यादा प्रभावी बनाया गया। इसमें लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सूचना के अधिकार के तहत मागी गई जानकारी का भी जवाब देना होगा। हर हाल में 30 दिन में जवाब देने का नियम है। जन सूचना अधिकारी पत्रावली में उपलब्ध जानकारी रिकार्ड से ही उपलब्ध कराएं। अपने विवेक से न दें। अगर कोई आरटीआइ 500 शब्दों से अधिक है, तभी उसे निरस्त किया जा सकता है। इस दायरे में लोक प्राधिकरण, केंद्र व राज्य के अधीन संस्थान, डीम्ड यूनिवर्सिटी, सरकार से सहायता ले रहे एनजीओ आते हैं। कोई भी सूचना दूसरे विभाग की है तो पांच दिन में उसे दूसरे विभाग में दे दिया जाए।

बताते चलें कि सबसे पहले 1766 में स्वीडन में इस कानून की शुरुआत हुई। अब 98 देशों में लागू हो चुका है। अगर कोई परेशान करने की नीयत से जवाब मांग रहा है और उसे एकत्रित करने में 30 दिन से अधिक का समय बर्बाद हो रहा है तो उसे निरस्त किया जा सकता है। राज्य सूचना आयुक्त गजेंद्र यादव ने अफसरों को तकनीकी गुर सिखाए।

ऑनलाइन भी कर सकेंगे आवेदन

मुख्य सूचना आयुक्त ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि सरकार आरटीआइ को आधुनिक बनाने के प्रयास कर रही है। अगर सब कुछ सही रहा तो जल्द ऑनलाइन भी आरटीआइ का जवाब मांगा जा सकेगा। इस पर सरकार काम रही है। इसके दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए सूचना का अधिकार नियमावली-2015 में बदलाव हुआ। संशोधन के बारे में कर्मचारियों को बताने के लिए प्रशिक्षण की शुरुआत हुई है। सूबेभर में 20,000 जन सूचना अधिकारियों एवं 5000 प्रथम अपीलीय अधिकारियों को दूसरे चरण में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 10 मंडलों में प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

Posted By: Jagran

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