अलीगढ़, जेएनएन।  वर्षों से स्वदेशी की अलख जगाने वाले संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने अपनी रणनीति बदल दी है। मंच अब स्वदेशी वस्तुओं की लिस्ट नहीं बांटेंगे, जो वर्षों से करता आया है। अब संगठन जैविक खेती की ओर ध्यान दे रहा है। इसके लिए किसानों को प्रोत्साहित भी कर रहा है। स्वदेशी जागरण मंच के पदाधिकारियों का कहना है कि स्वदेशी का कोई एक प्रारुप नहीं है। सम-सामायिक मुद्​दों को भी उठाना उसका लक्ष्य है।

1990 से स्‍वदेशी जागरण मंच सक्रिय

1990 के दशक में स्वदेशी जागरण मंच स्वदेशी वस्तुओं को लेकर हुंकार भरता हुआ नजर आता था। मंच के कार्यकर्ता गांव से लेकर शहर तक, मुहल्ले से लेकर शहर की गलियों तक में स्वदेशी का पर्चा लिए घूमते रहते थे। वो पर्चे के माध्यम से आम जनता को बताते थे कि कौन सी वस्तु स्वदेशी है और कौन सी विदेशी? विदेशी वस्तु खरीदने से देश को कितना बड़ा नुकसान होगा इसके बारे में भी बताया करते थे। वास्तव में तब तमाम लोग हैरान रह जाते थे कि विदेशी वस्तुएं खरीदकर वो देश को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। हालांकि, यह मुहिम तमाम लोगों के गले अभी तक उतरी नहीं और आज भी लोग तमाम कंपनियों के विदेशी उत्पाद खरीद रहे हैं। स्वदेशी जागरण मंच की इस मुहिम से लोगों के अंदर धारणा बन गई थी कि मंच का काम पर्चा बांटना और लोगों को स्वदेशी और विदेशी के बारे में जागरुक करना है, मगर अब स्वदेशी जागरण मंच खेती-किसानी के बारे में भी जागरूक करने लगा है। जैविक खेती के बारे में प्रमुखता से गांव के किसानों को जागरूक कर रहा है।

हम अपने मूल अभियान से भटक रहे

मंच के जिला संयोजक रजनीश राघव का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि हम अपने मूल अभियान से भटक रहे हैं, बल्कि हम मूल अभियान से और अधिक पुख्ता तरीके से लगे हुए हैं। स्वदेशी का मतलब देश के लोगाें के अंदर खुशहाली लाने का है। यदि लोग रासायनिक युक्त अनाज का प्रयोग करेंगे तो बीमार होंगे, इसके लिए हमने जैविक खेती पर जोर दिया है। जब लोग स्वस्थ्य रहेंगे तभी तो स्वदेशी वस्तुएं खरीद सकेंगे। इसलिए जैविक खेती पर इन दिनों काफी जोर दिया जा रहा है। रजनीश राघव ने कहा कि किसानों काे बताया जा रहा है कि रासायनिक खादों के प्रयोग से कैसे उनकी खेती बर्बाद हो रही है। उससे क्या-क्या नुकसान है, ये भी बताया जा रहा है। किसानों को बताया जा रहा है कि रासायनिक और कीटनाशक अनाजों के प्रयोग से वो स्वयं बीमार पड़ेंगे, साथ ही परिवार के लोग भी बीमार पड़ेंगे, इसलिए रासायनिक खादों का प्रयोग कतई न करें। इसका परिणाम भी आने लगा है तमाम गांवों में किसान सोच बदलने लगे हैं। रजनीश राघव ने कहा कि यह लंबी लड़ाई है, इसमें धीरे-धीरे परिवर्तन आएगा, मगर जीत हमारी ही होगी। क्योंकि लोगों को एक दिन समझ में आने लगेगा कि उन्हें किस तरह के अनाज का प्रयोग करना चाहिए। उसके बाद वो जैविक खेती की ओर बढ़ेंगे।

अनाज के बिना कोई जीवित नहीं रह सकता

महानगर संयोजक अमित अग्रवाल ने कहा कि यदि बाजार में बना कोई उत्पाद दूषित हो तो उससे बचा जा सकता है, मगर खेतों में पैदा अनाज दूषित हो जाए तो उससे बचा नहीं जा सकता है। क्योंकि अनाज के बिना कोई जीवित नहीं रह सकता है। मगर, इतने बड़े पैमाने पर फसलों में रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं डाली जा रही हैं, जो समझ से परे हैं। किसान स्वयं नहीं सतर्क हो रहा है, बेचने वाला परेशान नहीं हो रहा है कि इससे उसके बच्चे भी प्रभावित होंगे। आखिर ये होड़ की लड़ाई कहां रुकेगी। रासायनिक खेती और कीटनाशक के प्रयोग से तो हर वर्ग प्रभावित होगा। इसलिए स्वदेशी जागरण मंच जैविक खेती की ओर जोर दे रहा है। अमित अग्रवाल ने कहा कि यह कोई छोटी-मोटी लड़ाई नहीं है, बल्कि इसमें लंबा समय लगेगा, मगर बदलाव जरूर आएगा।

Edited By: Anil Kushwaha