अलीगढ़, जागरण संवाददाता।  वर्तमान युग विज्ञान का युग है। हमारे समस्त कार्य, उपकरण, रहन-सहन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सभी विज्ञान पर आधारित है। जन-जन के मन में विज्ञान की विचारधारा हिलोरे ले रही है। इसी आधार पर वह जीवन यापन कर रहा है, देश विकसित होता जा रहा है, भारत की प्रगति भी किसी से छिपी नहीं है। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के द्वारा दिये गये नारे को आगे बढ़ाते हुए देश के मनोबल को ऊंचा ही नहीं किया अपितु शास्त्री जी की मनोवृत्ति को सभी के सामने प्रस्तुत किया।

हमारे वैज्ञानिकों व डाक्‍टरों ने कीर्तिमान बनाया

प्रधानमंत्री का यह नारा ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान,’ हमारे इंजीनियर और वैज्ञानिकों को एक शक्ति देता है। मंगलयान इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। हमारे डाक्टरों ने विश्व में सबसे पहले कोविड-19 की वैक्सीन बनाकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। हमें लगता है इस मनोवृत्ति को स्कूली जीवन से जोड़ना भविष्य के लिए अति हितकर होगा। इसलिए नए-नए विज्ञान संस्थान खोले जाएं, अन्वेषण करने वाले छात्रों को सुविधाएं दी जाएं। वैज्ञानिकों को उनकी उपलब्धि पर पुरस्कृत किया जाए। तभी हमारा सपना साकार होगा और भारत विश्वगुरू कहलाएगा।

भारत में लगभग 150 गुरुकुल 

जब दुनिया के लोग एबीसीडी सीख रहे थे तब भारत में लगभग 150 गुरुकुल संचालित थे जिन सब का वैज्ञानिक आधार था, सभी शिक्षक वैज्ञानिक मनोवृत्ति वाले होते थे। शास्त्र ज्ञान, अस्त्र-शस्त्र संचालन, हवन पद्धत्ति, मंत्रोच्चारण, सांस्कृतिक आदि सभी का आधार वैज्ञानिक होता था। आज भी यथावत उसका परिपालन किया जा रहा है। प्रातःकालीन सूर्योदय के समय सूर्य से चार प्रकार की किरणे निकलती हैं। जिनके नाम क्रमशः हैं- बैखरी, मध्यमा, परा और पश्यन्ती। बैखरी से ओम का स्वर निकलता हैं जो विश्व भर में फैल जाता है, नासा ने भी इसकी पुष्टि की है। प्रत्येक भारतीय पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ में विश्वास रखता है और मंत्रों के प्रारम्भ में ओम शब्द का उच्चारण करता है। मध्य काल में इस प्रक्रिया में थोड़ी कमी आयी थी जिस कारण से अनेक बीमारियों ने समाज में जन्म लिया। परन्तु आज पुनः भारत खोई हुई शक्ति प्राप्त कर रहा है।

रामायण काल में नल और नील ने सात दिन में बनाया था 35 किमी लंबा पुल 

रामायण के समय श्रीराम की सेना में नल और नील दो ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने 35 किलोमीटर लंबा पुल सात दिनों में बनाकर तैयार किया था। जो आज असम्भव सा प्रतीत होता है। जबकि चौदह वर्ष का वनवास व्यतीत करने के बाद राम अपने सभी साथियों सहित पुष्पक विमान से अयोध्या गए थे जो मन की गति से चलता था। जिस दिन हम यह सफलता प्राप्त कर लेगें उस दिन कूलर, पंखे, रोबोट, कैमरे, उसी प्रकार चलेंगे। बड़े-बड़े कारखानों के सयंत्र, खेती के यंत्र, वाहन, सेना के अस्त्र-शस्त्र पलक झपकते ही कार्य संचालन में लग जाएंगे। हमारे प्रधानमंत्री भारत को विश्वगुरु बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने अभी तक जो ख्याति प्राप्त की है वह किसी से छिपी नहीं है। उन्हें हमारे देश के वैज्ञानिकों और विज्ञान पर पूर्ण भरोसा है। इसीलिए प्रत्येक जन वैज्ञानिक मनोवृत्ति अपना रहा है। साथ ही साथ पाखंड, ढोंग, भूत-प्रेत हमारे मन से दूर होते जा रहे हैं। प्रत्येक अभिभावक अपने बच्चे को वैज्ञानिक बनाना चाहता है। सभी का मानना है कि वैज्ञानिक आधार धन और ऐश्वर्य का सामान इकट्ठा करने का एक सफल माध्यम है। क्योंकि वैज्ञानिक मनोवृत्ति वाले चाणक्य की कार्य-योजना के बल पर ही चलकर चन्द्रगुप्त ने विश्व विजेता बनने का स्वप्न देखा था। आचार्य चरक ने औषोधियों के निर्माण में, आचार्य सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में, बाणभट्ट ने खगोल शास्त्र में एवं धनवंतरी ने चिकित्सा के क्षेत्र में वैज्ञानिक आधार को अपनाया था। जो आज भी हमारे वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

वैज्ञानिक आधार पर दें शिक्षा

आदिमानव ने वैज्ञानिक मनोवृत्ति के आधार पर ही आग, पहिये और अस्त्र-शस्त्रों की खोज की थी। हमारे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का कहना था कि मुझे राष्ट्रपति के नाम से नहीं बल्कि मिसाइल मैन या वैज्ञानिक के नाम से जाना जाए। हमारे वैज्ञानिक भूगोल ओर खगोल के अन्वेषण में कार्यरत हैं। प्रत्येक स्कूल संचालक छात्रों को वैज्ञानिक आधार पर शिक्षा देना चाहता है। अतः हमें भी अपने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। इस ज्ञान को आगे बढ़ाना चाहिए पता नहीं कब धूल में छिपा कोई हीरा भारत की शान बढ़ा दे। छोटे स्तर से शिक्षा प्राप्त करने वाला कोई सितारा कब चमक उठे।

Edited By: Anil Kushwaha