विवेक शर्मा, गभाना । चुनाव में नेताओं के लच्छेदार भाषण होते हैं, नेताजी खूब दावे भी करते हैं मगर, कुछ ऐसी बातें होती हैं, जो जेहन में उतर जाती हैं और ताउम्र जाती नहीं। इस बार का चुनाव डिजिटल पर आ गया है, मगर पहले चुनाव बिना रैलियों के पूरा नहीं होता था। धक्का-मुक्की, झंडा, बिल्ला सब होता था। रैलियों में नेताओं की लेटलतीफी बेशुमार रहती थी।

कस्‍बे के व्‍यापारी वेदप्रकाश ने सुनाई कहानी

चुनाव की बातें करते हुए कस्बे के व्यापारी वेदप्रकाश गुप्ता ने 1993 के चुनाव में खो गए। उन्होंने बताया कि अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद ये चुनाव हो रहा था। इसलिए रामभक्तों में जोश हिलोरे मार रहा था। गभाना के अनाज मंडी के पास पशु प्रदर्शनी मैदान में रैली थी। जिसे अटल बिहारी वाजपेयी को रैली को संबोधित करना था। उस समय वो भारत के प्रधानमंत्री नहीं बने थे, मगर उनके सुनने और चाहने वालों की तादात लाखों में हुआ करती थी। जनता सिर माथे बिठाने को आतुर रहती थी। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी इस रैली में आने वाले थे। दोनों नेता सड़क मार्ग से अलीगढ़ से गभाना आने वाले थे। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह विवादित ढांचा ढहने के बाद देश की राजनीति में छाए हुए थे। उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। इसलिए उनके जोशीले भाषण को भी हर कोई सुनना चाहता था। गभाना में दोपहर दो बजे सभा थी। जिले के तमाम नेता मंच पर भाषण दे रहे थे, वो पूरी तरह जोश भरने की कोशिश कर रहे थे, मगर नारे अटल-कल्याण जिंदाबाद के लग रहे थे। हर कोई दोनों नेताओं का दीदार करने को आतुर था।

नेता के इंतजार में घंटों बैठे रहे लोग

सांझ ढलती जा रही थी और मगर जनता का जोश कम होने का नाम नहीं ले रहा था। सभी का जोश हिलाेरे मार रहा था। राम भक्त आएंगे, अयोध्या में भव्य मंदिर बनाएंगे, बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का, रामभक्त देखो आ रहे, दुनिया में दो लाल छा रहे आदि नारे गूंज रहे थे। बगल में बैठे एक बुजुर्ग युवाओं को नारे बना-बनाकर दे रहे थे और युवा जोश में उन्हीं नारों को लयबद्ध तरीके से लगा रहे थे। ये नारे इतने लय से बैठते थे कि थोड़ी ही देर में पूरी रैली में छा जाते थे। कई बार तो नारों के बीच में माइक की आवाज थम जाया करती थी ये क्रम चलता रहा। शाम सात बजे गए। अंधेरा होने लगा, तभी मेरे बगल में बैठे साथी ने कहा कि अरे शाम हो गई। नेताजी दो बजे आने थे, सात बज गए अब नहीं आएंगे। उस समय मोबाइल था नहीं, जो पल-पल की सूचना मिलती। बस, मंच पर नेताजी भाषण देने से पहले एक बात जरूर कहते, देखो माननीय अटल बिहारी वाजपेयी और माननीय कल्याण सिंह कुछ ही देरी में आ रहे हैं। अलीगढ़ से चल दिए हैं। तभी बगल में बैठे ताऊ बरस पड़े। उछल कर बोलें, दो बजे से अलीगढ़ से आ रहे हैं कह रहे हो, सात बज गए मगर नेताजी दिखाई नहीं दिए। पर, वो बात मुझे भूलती नहीं है। कोई भी अपने स्थान से खिसक नहीं रहा था। हर कोई अंधेरा होने के बाद भी रैली स्थल पर डटा हुआ था। भूख और प्यास की भी किसी को कोई चिंता नहीं थी।

दोपहर से शाम तक किया गया इंतजार

रात आठ बजे के करीब अटल और कल्याण सिंह मंच पर चढ़े। उसके बाद तो वहां मौजूद लोगों का जोश देखते ही बन रहा था। मानों ऐसा लग रहा था कि भगवान प्रगट हो गए हों। हर कोई खुशी से बल्लियों से उछल रहा था। उस समय लाइट और माइक का भी बहुत अच्छा इंतजाम नहीं था, मगर दोनों नेताओं का रात करीब 10 बजे तक भाषण सुना उसके बाद ही घरों लौटें। वो दौर याद आता है तो मन को बहुत सुकून मिलता है। सच, आज का समय होता तो रैली स्थल से आधे लोग चले जाते, इतना इंतजार नहीं करते। अटल-कल्याण के भाषण का एेसा जादू चला कि भाजपा से बरौली से मुनीष गौड़ रिकार्ड मतों से जीत गए, इतना ही नहीं अटल और कल्याण का ही भाषणों का जादू था जो बरौली विधानसभा में पहली बार भाजपा को जीत मिल पाई थी।

Edited By: Anil Kushwaha