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Hathras Stampede Case: तो बचाई जा सकती थी घायलों की जान...121 मौतों के बाद स्वास्थ्य विभाग पर लगे सनसनीखेज आरोप

Hathras Stampede Case Update News अस्पताल में घनघोर लापरवाही बरती गई थी। ट्रॉमा सेंटर में डाक्टर नहीं थे। वहीं सिकंदराराऊ में पहुंचे घायलों को कोई इलाज ही नहीं मिला। स्वास्थ्य विभाग सवालों के घेरे में हैl लोगों ने घायलों को समय से समुचित इलाज उपलब्ध न कराने आरोप लगाए हैं l जांच समिति की रिपोर्ट में भी ट्रॉमा सेंटर को लेकर इस बात का जिक्र किया गया है।

By Abhishek Saxena Edited By: Abhishek Saxena Wed, 10 Jul 2024 03:00 PM (IST)
Hathras News: हाथरस में हुए सत्संग की फाइल फोटो।

सुरजीत पुंढीर l जागरण अलीगढ़। Hathras Case: मन को विचलित करने वाली दो जुलाई की वीडियो और तस्वीरें तो सभी ने देखी होंगी। सिकंदराराऊ ट्रांमा सेंटर पर दर्जनों घायल चीख रहे थे। बरामदे के बाहर धरती पर ही मृतकों के शव बिखरे पड़े थे। ट्रामा सेंटर के अंदर न चिकित्सक थे और न पर्याप्त इंतजाम। तड़पते घायलों को आक्सीजन तक नहीं मिल पा रहीं थी।

हादसे के कुछ घंटों में पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी तो ट्रामा सेंटर में पहुंच गए थे, मगर स्वास्थ्य विभाग का ज्यादातर स्टाफ फिर भी नदारद था। चर्चाएं थीं कि अगर स्वास्थ्य विभाग सतर्क होता तो कई लोगों को बचाया जा सकता था। इसलिए पीड़ित शुरुआत से ही आयोजकों के अलावा पुलिस-प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को भी कठघरे में खड़ा कर रहे थे, मगर यह विभाग कार्रवाई में कोसों दूर हैं।

ट्रॉमा में नहीं मिला था इलाज

लोग सवाल उठा रहे हैं कि घनघोर लापरवाही में कुछ जवाबदेही तो इस विभाग की भी होनी चाहिए थे। घटना के बाद ट्रॉमा सेंटर में घायल इलाज के लिए तड़प रहे थे। घटना के दिन एक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हुआ। इसमें लोग कह रहे थे कि मौके पर न तो पर्याप्त दवाएं हैं और न ही स्टाफ। आक्सीजन तक नहीं है। एंबुलेंस भी इधर-उधर से मंगाई जा रही हैं। निजी वाहनों से ही स्वयं ही लोग घायलों को ढो रहे हैं।

हाथरस सत्संग में खेतों की तरफ भागी थी अनुयायियों की भीड़।

मौके पर पहुंचने में लगा समय

सबसे बड़ी अव्यवस्था तो चिकित्सकों की है। इससे साफ था कि एक-दो फार्मासिस्ट के सहारे ही दर्जनों लोगों को इलाज हो रहा था। जिला मुख्यालय से भी स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों ने मौके पर पहुंचने में काफी देर की।

एटा, अलीगढ़ व आगरा में घायलों को रेफर किया गया। ज्यादातर पोस्टमार्टम भी अन्य जिलों में कराए गए। इसके चलते घटना के दिन से ही लोगों में स्वास्थ्य विभाग को लेकर आक्रोश था।

हाथरस हादसे के बाद अधिकारियों ने देखा था घटनास्थल।

समय पर नहीं मिला इलाज, पीड़ितों के स्वजन थे परेशान

आरोप था कि अगर घायलों को समय रहते इलाज मिलता तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी। एसआईटी के समक्ष भी प्रत्यक्षदर्शियों ने स्वास्थ्य विभाग को कठघरे में खड़ा किया था। पीड़ितों ने भी लापरवाही के आरोप लगाए थे, मगर प्रशासनिक कार्रवाई की जद से इस विभाग के जिम्मेदार दूर हैं। सरकार ने एसआईटी की जांच रिपोर्ट पर प्रथम दृष्टया छह पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों को घटना के लिए जिम्मेदार मानते हुए निलंबित किया है। हालांकि, पीड़ितों के स्वजन इससे संतुष्ट नहीं हैं।

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इंतजाम होते तो मां की नहीं होती मृत्यु

जितेंद्र पिलखना निवासी जितेंद्र सिंह की मां शांति देवी की हादसे में मृत्यु हुई थी। जितेंद्र बताते हैं कि दो जुलाई को जब अचानक उन्हें हादसे के बाद वह अपने भाई के साथ ट्रामा सेंटर पहुंचे। उनकी मां शांति देवी जिंदा थीं। वह चीख रहीं थीं, मगर ट्रामा सेंटर पर आक्सीजन तक नहीं थी। स्टाफ भी न के बराबर ही था। कुछ देर बाद मां की मृत्यु हो गई। इस तरह अन्य भी कई घायल थे, जिन्हें अगर समय पर उपचार मिलता तो वह बच सकते थे, मगर ट्रामा् सेंटर पर घनघोर लापरवाही थी।

कथित भाेलेबाबा और उनकी पत्नी की एक सत्संग के दौरान की तस्वीर।

बचाई जा सकती थीं कई जान

छोटेलाल हादसे में अपने इकलौते छह वर्षीय बेटे पंकज व पत्नी मंजू को खोने वाले पिलखना निवासी छोटेलाल का कहना है कि अभी सभी दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई है। अस्पताल में बेटे पंकज की मृत्यु हो चुकी थी और पत्नी मंजू की सांसें चल रही थीं। वह खुद चिकित्सकों को पुकार रहे थे, मगर वहां न चिकित्सक थे और ना ही आक्सीजन। अगर अस्पताल में पर्याप्त व्यवस्थाएं होतीं तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।