अतरौली के पूर्व विधायक डॉक्टर अनवार खां का निधन, 1980 में कल्याण सिंह को हराया था
अतरौली के पूर्व विधायक और पूर्व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री डॉ. अनवार खां का 89 वर्ष की आयु में निधन हो ...और पढ़ें
HighLights
पूर्व विधायक डॉ. अनवार खां का 89 वर्ष की आयु में निधन।
1980 में कल्याण सिंह को हराकर बने थे अतरौली विधायक।
छह प्रधानमंत्रियों से था उनका राजनीतिक परिचय।
जागरण संवाददाता, अलीगढ़। अतरौली के पूर्व विधायक और पूर्व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री डॉक्टर अनवार खां का मंगलवार देर रात 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। पुत्र शाकिब अनवार और नवेद अनवार को सांत्वना देने के लिए बुधवार को लोगों का तांता लगा रहा। अतरौली विधानसभा क्षेत्र को उन्होंने अपनी कर्मस्थली बनाया और दशकों तक यहां की राजनीति में सक्रिय रहे।
डॉ. अनवार खां का राजनीतिक सफर 1957 में नगर पालिका के सभासद बनने से शुरू हुआ। वह लगातार करीब 20 वर्ष तक सभासद रहे। इसके बाद उन्होंने विधानसभा की राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1974 में बीकेडी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जनसंघ प्रत्याशी कल्याण सिंह से कुछ ही वोटों से हार गए। 1977 में भी बीकेडी से चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली। वर्ष 1980 में कांग्रेस के टिकट पर उन्होंने तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री कल्याण सिंह को हराकर पहली बार विधानसभा का चुनाव जीता।
अनवार के लिए इंदिरा गांधी ने अतरौली में मांगे थे वोट
1980 का चुनाव डॉ. अनवार खां के राजनीतिक जीवन का सबसे अहम पड़ाव रहा। उनके प्रचार के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अतरौली आई थीं और जनसभा को संबोधित किया था। उन्होंने जनता से अनवार खां को जिताने की अपील करते हुए क्षेत्र के विकास की जिम्मेदारी लेने की बात कही थी।
विधायक बनने के बाद अनवार खां ने अतरौली क्षेत्र के दर्जनों गांवों को प्रमुख सड़कों से जोड़ने का काम कराया। 1980 से 1989 तक वह उत्तर प्रदेश टेक्सटाइल प्रिंटिंग कॉरपोरेशन के उपाध्यक्ष, यूपी ब्रासवेयर के चेयरमैन, रुड़की यूनिवर्सिटी सीनेट के सदस्य और उत्तर प्रदेश 20 सूत्रीय कार्यक्रम के सदस्य रहे। वह अतरौली मंडी समिति और कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन भी रहे।
इन चुनाव में नहीं मिली जीत
इसके बाद उन्होंने 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं मिली। बावजूद इसके अतरौली की राजनीति में उनकी पकड़ और व्यक्तिगत पहचान बनी रही।
कल्याण सिंह से चुनावी मुकाबला, मगर निजी रिश्ते में सम्मान
कल्याण सिंह के साथ उनके राजनीतिक मुकाबले की चर्चा अतरौली की राजनीति में लंबे समय तक होती रही। अनवार खां बताया करते थे कि उनके और कल्याण सिंह के बीच कभी व्यक्तिगत बातचीत नहीं हुई। दोनों ने एक-दूसरे से किसी काम के लिए संपर्क भी नहीं किया। हालांकि, उनकी पत्नी के निधन पर कल्याण सिंह ने फोन कर शोक संवेदना व्यक्त की थी।
पुत्रवधू के सामने चुनाव लड़ने से किया था इनकार
वर्ष 2007 में जब कल्याण सिंह की पुत्रवधू प्रेमलता चुनाव लड़ रही थीं, तब कांग्रेस हाईकमान ने अनवार खां से चुनाव लड़ने को कहा था। उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि प्रेमलता उनकी पुत्रवधू की तरह हैं और वह उनके सामने चुनाव नहीं लड़ सकते। साथ ही कहा था कि अगर कल्याण सिंह चुनाव लड़ेंगे तो वह जरूर मुकाबले में उतरेंगे।
सांप्रदायिक राजनीति के दौर में भी नहीं छोड़ा मैदान
अनवार खां अतरौली के चुनावी समीकरणों को बारीकी से समझते थे। वह बताते थे कि क्षेत्र में मुस्लिम मतदाता करीब चार प्रतिशत थे। करीब 250 पोलिंग बूथों पर उन्हें बढ़त मिलती थी, जबकि लगभग 150 बूथों पर कल्याण सिंह आगे रहते थे। लोध बहुल बूथों पर 95 प्रतिशत तक मतदान और उनके प्रभाव वाले बूथों पर करीब 30 प्रतिशत मतदान होने की बात भी वह करते थे। वह बूथ कैप्चरिंग को भी उस दौर की बड़ी समस्या बताते थे।
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एक बार 204 वोटों से हार गए थे चुनाव
अनवार खां का मानना था कि 1990 के बाद राजनीति में सांप्रदायिक रंग बढ़ा। इसके बावजूद 1993 की राम लहर में भी उन्हें करीब 31 हजार वोट मिले। वह अपने पहले विधानसभा चुनाव की हार को भी याद करते थे, जब वह महज 204 वोटों से चुनाव हार गए थे।
डॉ. अनवार खां अक्सर एक शेर पढ़ा करते थे
'सितमगर तुझसे उम्मीद-ए-वफा होगी जिसे होगी,
हमें तो देखना यह है कि तू जालिम कहां तक है।'
उनके निधन से अतरौली ने एक ऐसे राजनेता को खो दिया, जिसने करीब सात दशक तक सार्वजनिक जीवन में रहकर क्षेत्र की राजनीति को करीब से देखा और कई दौर के बदलावों का हिस्सा बना।
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छह प्रधानमंत्रियों के बीच अपनी पहचान
डॉ. अनवार खां भले ही कई चुनाव हारे, लेकिन उनकी राजनीतिक शख्सियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश के छह प्रधानमंत्रियों, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह से उनका राजनीतिक परिचय रहा। वह कहते थे कि ये सभी उन्हें नाम और चेहरे से जानते-पहचानते थे।
