23 साल पुराने रोरावर कांड में छह भाजपा नेता दोषमुक्त, अभियोजन साक्ष्य साबित करने में विफल
अलीगढ़ के 23 साल पुराने रोरावर कांड से जुड़े सांप्रदायिक तनाव के मुकदमे में छह भाजपा नेताओं को दोषमुक्त कर ...और पढ़ें

जागरण संवाददाता, अलीगढ़। कर्फ्यू के बीच हुए हंगामे का मुकदमा 23 साल तक अदालत में चला। लेकिन आरोपितों की पहचान और घटना में उनकी व्यक्तिगत भूमिका ही अभियोजन साबित नहीं कर सका। वर्ष 2003 में शहर के सांप्रदायिक तनाव के दौरान धार्मिक नारेबाजी, पुलिस-प्रशासन से अभद्रता और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में दर्ज मुकदमे में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट संख्या-9 की न्यायाधीश संगीता-1 ने छह भाजपा नेताओं को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने माना कि आरोपों की पुष्टि के लिए पेश साक्ष्य संदेह से परे नहीं हैं। इस मामले में गवाहों के बयानों और विवेचना की खामियों ने अभियोजन के दावे को कमजोर कर दिया।
यह है पूरा मामला
मामला आठ नवंबर 2003 का है। इससे करीब सात दिन पहले श्मशान घाट और कब्रिस्तान के रास्ते को लेकर विवाद सांप्रदायिक संघर्ष में बदल गया था। शहर में इसे रोरावर कांड के रूप में जाना जाता है।
तनाव के बाद कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया था। तत्कालीन भाजपा विधायक संजीव राजा समेत कई नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। इसी दौरान आठ नवंबर को देहली गेट चौराहे के पास लक्ष्मी सिनेमा से आगे कनवरीगंज-उस्मानपाड़ा तिराहे पर नया विवाद हुआ।
शाम करीब छह बजे तत्कालीन भाजपा सांसद शीला गौतम अपनी जिप्सी से वहां पहुंचीं। उनके साथ आए समर्थकों पर धार्मिक नारेबाजी कर माहौल बिगाड़ने, पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों से अभद्रता करने और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगा। शाम करीब 6:15 बजे पुलिस ने सभी को गिरफ्तार कर लिया।
गवाह आरोपितों को पहचान नहीं सके, विवेचना पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान तत्कालीन थाना प्रभारी अरुण कुमार सिंह, विवेचक लक्ष्मी नारायण, कांस्टेबल अशोक कुमार और तत्कालीन सेक्टर मजिस्ट्रेट आशुतोष द्विवेदी के बयान दर्ज हुए। जिरह के दौरान कांस्टेबल अशोक कुमार ने स्वीकार किया कि वह आरोपितों को पहले से नहीं जानते थे। नारेबाजी करने वालों के नाम भी रिपोर्ट दर्ज कराते समय नहीं बताए गए थे। सेक्टर मजिस्ट्रेट ने घटना के समय अपनी मौजूदगी और आरोपितों की पहचान के संबंध में स्पष्ट जानकारी होने से इनकार किया।
विवेचक ने भी माना कि उसने घटनास्थल पर किसी व्यक्ति से पूछताछ नहीं की थी और आरोपितों की पहचान के लिए स्वतंत्र रूप से कोई जानकारी नहीं जुटाई थी। घटनास्थल के नक्शे में नारेबाजी का स्थान और मस्जिद तक दर्ज नहीं की गई थी। अदालत ने इन परिस्थितियों को अभियोजन के साक्ष्यों की विश्वसनीयता के आकलन में महत्वपूर्ण माना।
ये हुए दोषमुक्त
दोषमुक्त किए गए छह आरोपितों में भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष गोपाल सिंह, राजेंद्र कुमार, नागेंद्र प्रताप सिंह, परशुराम, सिद्धार्थ और गिरीश शामिल हैं। नागेंद्र प्रताप सिंह मौजूदा भाजपा एमएलसी (स्नातक) डा. मानवेन्द्र प्रताप सिंह के भाई हैं। परशुराम तत्कालीन सांसद शीला गौतम के निजी सचिव थे।
सिद्धार्थ विश्व हिंदू परिषद के जिला स्तरीय पदाधिकारी थे, जबकि गिरीश स्थानीय निवासी हैं। राजेंद्र कुमार भाजपा में सक्रिय रहे। आरएसएस के तत्कालीन विभाग प्रचारक प्रशांत अरोड़ा की पत्रावली अलग चल रही है। गोपाल सिंह ने बताया कि सपा सरकार ने राजनीतिक द्वेष भावना से हमें गिरफ्तार किया गया था। न्यायालय में आरोप सच साबित नहीं हो पाए।
चार धाराओं में दर्ज हुआ था मुकदमा
देहली गेट थाने में आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 353, 153ए और 188 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। इनमें दंगा, लोक सेवक को कर्तव्य से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल प्रयोग, समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने और लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा के आरोप शामिल थे।
अदालत ने माना कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। बचाव पक्ष के अधिवक्ता योगेंद्र शर्मा लल्ला बाबू के अनुसार अनुसार, अदालत ने जमानतनामे निरस्त करते हुए सभी छह आरोपितों को 25-25 हजार रुपये के व्यक्तिगत बंधपत्र और समान राशि की जमानत दाखिल करने का निर्देश दिया है। ये बंधपत्र छह महीने तक प्रभावी रहेंगे।
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