अलीगढ़, जेएनएन। जिस बच्चे को मां ने नौ माह कोख में रखा, उसकी जुदाई का दर्द शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है। खाकी ने छह बच्चों को बरामद करके महिलाओं को जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा दिया। इस गिरोह को पकड़कर पुलिस ने अंधेरे में सुई ढूंढने जैसा काम किया है। शहर में लगातार तीसरा बच्चा जब महुआखेड़ा से चोरी हुआ तो खाकी सक्रिय हुई। दूर-दूर तक कोई सुराग नहीं था। लेकिन, पांच दिन के आंकलन के बाद पुलिस को सीसीटीवी में एक छोटा सा सुराग मिला। बस यहीं से टीमें लग गईं और 10 दिन की मेहनत के बाद आरोपितों को दबोचने के लिए जाल बिछा दिया। कप्तान खुद चौकी में बैठे रहे। शहर वाले मुखिया रातभर टीम को लेकर दबिश देते रहे। अधिकारियों की इस सक्रियता से नीचे वाली टीम का मनोबल खुद-ब-खुद बढ़ गया। नतीजतन सफलता मिली। इस सक्रियता को बनाए रखने की जरूरत है।

उगाही का खेल

जिले से इतनी सख्ती के बावजूद निचले स्तर पर सुधार नहीं हो पा रहा। कट्टी के वाहनों से उगाही का खेल बदस्तूर जारी है। हरियाणा के जिलों से आने वाले वाहन टप्पल, लोधा और खैर क्षेत्र से गुजरते हैं। यहीं से उगाही का खेल शुरू होता है। दाम तय होते हैं। अगर लैपर्ड है तो पांच सौ रुपये और थाने की गाड़ी है तो 1200 रुपये देकर धड़ल्ले से निकला जा सकता है। खास बात ये है कि निचले स्तर के कर्मचारी थाने की गाड़ी का भी दुरुपयोग करते हैं। राउंड के दौरान गाड़ी कहीं भी खड़ी कर ली जाती है तो उगाही शुरू हो जाती है। इधर, कट्टी के वाहनों में पशुओं को ठूंसकर भरा जाता है। पूरी गाड़ी पैक होती है। लेकिन, उगाही के आगे पशु क्रूरता का कोई मोल नहीं। यह खेल सिर्फ इन इलाकों में नहीं, बल्कि अकराबाद क्षेत्र के कुछ हिस्से भी इसमें रंगे हैं।

अफसोस, रितिक को नहीं बचा सके...

रितिक की हत्या ने सभी को झकझोर दिया है। इस घटना के पीछे एक आरोपित की रंजिश और बदला लेने की नीयत सामने आई। लेकिन, अन्य दो आरोपितों के शामिल होने का ठोस कारण नहीं पता चला। जबकि इन्हीं में से एक के घर में रितिक को मारा गया। उसी के घर की टिर्री का इस्तेमाल शव फेंकने में हुआ। चौंकाने वाली बात ये है कि 13 दिन तक किसी को खबर ही नहीं हो सकी। स्वजन ने पुलिस को भी जानकारी नहीं दी। बस रितिक के लौटने का इंतजार करते रहे। फिरौती की काल न आती तो शायद कुछ दिन और यह मामला दबा रहता। दूसरी तरफ आरोपितों की गलती से वह पकड़े गए। मामला ठंडा पड़ गया, तब जाकर फिरौती करके पुलिस को चुनौती दे डाली। लेकिन, पुलिस ने बिना चूक किए चंद घंटों में आरोपितों को दबोच लिया। लेकिन, अफसोस है कि रितिक को नहीं बचा सके।

सख्ती के बीच थानेदारी मजाक नहीं...

शहर के थानों का प्रभार भला कौन नहीं लेना चाहेगा। लेकिन, इन दिनों सख्ती के चलते सबकी सिट्टी-पिट्टी गुल है। कप्तान का सीधा फंडा है कि काम करो। सुविधाएं पूरी मिलेंगी। लेकिन, लापरवाही करोगे तो माफी की गुंजाइश नहीं होगी। अब ये अंदाज उन लोगों को तो पसंद आ रहा है, जो काम करने वाले हैं, मगर कुछ ऐसे हैं, जिन्हें आराम फरमाने और कमाई का चस्का लगा है। सख्ती के बीच ये सब बंद है तो समझ में आया कि थानेदारी मजाक नहीं। दूसरी तरफ काम का दबाव अब अधिक हो गया है। ताबड़तोड़ आपरेशन और कार्रवाई से पुलिस को सांस लेने की भी फुरसत नहीं है। थाने का चार्ज मिलने के बाद भी संतुष्टि नहीं मिल पाने का ये भी कारण हो सकता है। प्रभारी यही चाहते हैं कि सब ऐसे ही चलता रहे, नहीं तो लाइन में बेहतर हैं। जनता के लिए ऐसी सख्ती अच्छी है।

Edited By: Anil Kushwaha