संतोष शर्मा, अलीगढ़। शहर में छोटी बड़ी दो सौ अधिक मस्जिद हैं। इनमें कुछ ऐसी हैं। जिनका अपना ऐतिहासिक महत्व भी हैं। इन मस्जिदों में नमाज पढऩा लोग फक्र महसूस करते हैं। यहां इस्लाम के संदेश की तो सीख मिलती ही है, मानवता का भी पाठ पढ़ाया जाता है। मस्जिदों का इतिहास भी याद दिलाता है कि पूर्वजों ने किस सोच के साथ इनकी नींव रखी। शहर की जामा मस्जिद अपने आप में खास है। यह शहर की सबसे विशाल मस्जिदों में तो है ही देश की पहली मस्जिद भी जहां सबसे अधिक सोना और शहीदों की कब्र है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की जामा मस्जिद में शिया और सुन्नी एक साथ नमाज पढ़ते हैं। दुनिया भर में शायद ही ऐसी मिसाल देखने को मिलती हो। जमालपुर, दोदपुर, सर सैयद नगर जामा मस्जिद, समेत शहर में ऐसी मस्जिद हैं जिनमें सऊदी अरब की मस्जिदों का कल्चर दिखता है। रमजान में इन दिनों ये मस्जिद गुलजार हैं। हजारों लोग सुबह से शाम तक पांच वक्त की नमाज अदा करते हैं और दिनों-रात कुरान की तिलावत व वजीफा होता रहता है।

दुनिया की पहली मस्जिद  जहां शहीदों की कब्र हैं

आपको याद होगा, लोकप्रिय शो कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन ने एक सवाल पूछा था कि एशिया में ऐसी कौन सी मस्जिद है, जिसमें सबसे अधिक सोना लगा हुआ है? जवाब था... अलीगढ़ की जामा मस्जिद। मस्जिद बलाई किले के शिखर पर स्थित है। यह स्थान शहर का उच्चतम बिंदु है। जिसे शहर में ऊंचे भवन या ओवरब्रिज से देखा जा सकता है। इसके गुंबदों में कई कुंतल सोना लगा है। यहां कुल कितना सोना लगा है, इसका किसी को अन्दाजा नहीं हैं। रमजान में इन दिनों यह मस्जिद रोशनी से नहायी हुई है। देर रात तक यहां तरावीह होती है। इस ऐतिहासिक मस्जिद का निर्माण मुगलकाल में मुहम्मद शाह( 1719-1728) के शासनकाल में कोल के गवर्नर साबित खान ने 1724 में शुरू कराया था। 1728 में मस्जिद बनकर तैयार हो पाई। मस्जिद में कुल 17 गुंबद हैं। मस्जिद के तीन गेट हैं। इन दरवाजों पर दो-दो गुंबद हैं। यहां एकसाथ करीब 5000 लोग नमाज पढ़ सकते हैं। यहां औरतों के लिए नमाज पढऩे का अलग से इंतजाम है। इसे शहदरी (तीन दरी) कहते हैं। देश की शायद यह पहली मस्जिद होगी, जहां शहीदों की कब्रें भी हैं। 1857 गदर के 73 शहीदों की कब्रें हैं। इसे गंज-ए-शहीदान (शहीदों) की बस्ती भी कहते हैं। तीन सदी पुरानी इस मस्जिद में कई पीढिय़ां नमाज अदा कर चुकी हैं। अनुमान है कि इस वक्त मस्जिद में आठवीं पीढ़ी नमाज पढ़ रही है।

यहां शिया और सुन्नी पढ़ते हैं नमाज

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की जामा मस्जिद देश की इकलौती मस्जिद है, जहां शिया और सुन्नी दोनों पांचों वक्त की नमाज अदा करते हैं। यह परंपरा एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खां के जमाने से चली आ रही है। सर सैयद अहमद खां ने 1880 के पहले से ही कॉलेज मस्जिद (जामा मस्जिद) का निर्माण प्रारंभ कर दिया था। इसके निर्माण में सहयोग के लिए उन्होंने मुसलमानों से 20 रुपये प्रति माह दो साल तक देने की अपील की थी। 1912 में मस्जिद का स्ट्रक्चर बनकर तैयार हो गया। 1914 में भीकमपुर के हाजी मो. अहमद सईद खान ने 8200 रुपये व्हाइट एवं ब्लैक स्टोन फर्श लगाने के लिए दान किया। दिल्ली और अजमेर से नक्काशी करने वालों को बुलाया गया। तत्कालीन थाम्सन इंजीनियरिंग कॉलेज रुड़की के आर्किटेक्ट डिपार्टमेंट के इंजीनियरों द्वारा दिल्ली की शाही मस्जिद के पैटर्न पर इसको डिजाइन किया गया। 1 फरवरी 1915 में मस्जिद खुलने की विधिवत घोषणा की गई। यहां पहले सुन्नी और उसके बाद शिया नमाज पढ़ते हैं। मस्जिद एक सौ वर्ष से अधिक समय से एकता और भाईचारे का संदेश दे रही है। सर सैयद अहमद खां की नजर में शिया और सुन्नी दोनों बराबर थे। यहां पर न सिर्फ  ईद, बकरीद और जुमा अलविदा की नमाज बल्कि हर रोज पांचों वक्त की नमाज के अलावा जुमे की नमाज शिया और सुन्नी अदा करते हैं।

भारत में सबसे ज्यादा मस्जिद

दुनिया भर में कुल मिला कर भारत अकेला गैर इस्लामिक मुल्क है जहां सबसे ज्यादा तीन लाख मस्जिदें हैं। इतनी मस्जिद किसी इस्लामी मुल्कों तक में नहीं है। मस्जिदों मुसलमानों का धार्मिक केंद्र है। इसमें मुख्य रूप से नमाज का आयोजन किया जाता है। जिसमें पनस्थाना प्रार्थना, प्रार्थना शुक्रवार और ईद की प्रार्थना है। इसके अलावा बिना कार्य भी होते हैं। किसी जमाने में मस्जिदों को दान और जको? वितरण के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था जिसका प्रथा अब कम है। मस्जिदें अक्सर कुरान की शिक्षा के लिए एक केंद्र का काम करती हैं।

सबसे पहली मस्जिद काबा

 सबसे पहली मस्जिद काबा था। काबा के आसपास मस्जिद हराम का निर्माण हुआ। एक परंपरा के अनुसार काबा वह जगह है जहां सबसे पहले हजरत आदम अलैहिस्सलाम और हजरत हव्वा अलैहिस्सलाम ने जमीन पर नमाज पढ़ी थी। इसी जगह पर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हजरत  इस्माईल अलैहिस्सलाम के साथ एक मसजिद निर्माण की। दूसरी मस्जिद मस्जिद कबाय थी।  जिसकी नींव हजरत मुहम्मद साहब और स्लिम मदीना से कुछ बाहर उस समय रखी जब वह मक्का से मदीना हिजरत फरमा रहे थे। तीसरी मस्जिद, मस्जिदे नबवीश थी जिसकी नींव भी हजरत मुहम्मद और स्लिम ने मदीने में हिजरत के बाद रखी। मस्जिदे नबवी मुसलमानों का धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक केंद्र था। आज मस्जिद हराम और मस्जिदे नबवी मुसलमानों की पवित्र सबसे स्थान हैं।

ये मस्जिद भी हैं खास

ऊपर कोट क्षेत्र में कई प्रमुख मस्जिद हैं। इनमें शीशे वाली मस्जिद, मोती मस्जिद, बू अली शाह की मस्जिद प्रमुख हैं। फूल चौक स्थित छतारी वाली मस्जिद, खैर रोड स्थित लाल मस्जिद, जमालपुर में ईदगाह जामा मस्जिद के अलावा रसलगंज, मैरिस रोड, दोदपुर, सर सैयद नगर, टूट बाउंड्री जमालपुर समेत कई और मस्जिद हैं जहां लोग बड़ी संख्या में इबादत करते हैं। दोदपुर स्थित मस्जिद के केयर टेकर इमरान खान बताते हैं कि यह सौ साल पुरानी मस्जिद है। जिसका दस साल पहले जीर्णोद्धार हुआ था। हर मस्जिद का गुंबद लगभग समान होता है। टूटी बाउंड्री के पास स्थित मस्जिद का भी जीर्णोद्धार हो रहा है, जिसमें लाल पत्थर का इस्तेमाल हो रहा है।

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Posted By: Mukesh Chaturvedi