अलीगढ़, जेएनएन। शहर में जब भी जलभराव होता है तो अफसर शहर का आकार कटोरानुमा बताकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने में लग जाते हैं। पिछले कई दशकों से ऐसा ही होता आ रहा है। जलभराव की असली जड़ क्या है ? इसकी तह में जाने व समाधान निकालने पर शायद ही कभी गहनता से मंथन हुआ हो। अलीगढ़ संभवत पहला जिला होगा जहां की ड्रेनेज व्यवस्था पंपों पर टिकी है। नगर निगम का हर माह लाखों रुपये का तेल पंपों ही खर्च होता है। तेल की कीमत के बाराबर भी अगर पैसा बेहतर ड्रेनेज व्यवस्था पर खर्च कर दिया होता तो शहर की तस्वीर आज कुछ और ही होती। नवागत डीएम का ड्रैनेज व्यवस्था देखकर नाराज होना स्वाभाविक है। अलीगढ़ को स्मार्ट सिटी में शामिल हुए तीन साल हो गए, लेकिन स्मार्ट ड्रेनेज सिस्टम की नींव नहीं रख पाए। निगम का बड़ा बजट नाला निर्माण, नाला सफाई व पानी निकालने में ही जा रहा है।

ये तो जान लेवा हैं

नगर निगम अफसरों को डीएम को उन नालों को भी दिखाना चाहिए जो गहरे और खुले हुए हैं। इनमें आए दिन गाय आदि जानवर गिरते रहे हैं। शहर के नालों में डूबकर बच्चों की भी मौत हो चुकी है। लेकिन, नालों को ढकने पर किसी ने जोर नहीं दिया। नालों को ढकने के भी लाभ हैं। अव्वल तो पॉलिथीन आदि का कचरा नहीं जाएगा दूसरा इन नालों के ढ़कने से रास्ता भी चौड़ा हो जाएगा। दूसरे महानगर में ऐसा हुआ भी है। नालों की जगह के ऊपर पार्क तक बनाए जाते हैं। स्मार्ट शहर के लिए ये बहुत जरूरी भी हैं। हैरानी की बात ये भी है कि यहां ड्रेनेज और सीवरेज की लाइन एक ही हैं। इसी पानी से किसान फसलों की सिंचाई करते हैं। शहर किनारे के खेतों में उगीं सब्जियां इस लिए सेहत के लिए हानिकारक हैं। अलीगढ़ ड्रेनेज से सबसे अधिक किसान फसलों की सिंचाई करते हैं।

इधर भी दें ध्यान

शहर की सबसे बड़ी समस्या अतिक्रमण बना हुआ है। ऐसा कोई मार्ग नहीं जहां लोगों ने अवैध रूप से सामान रखकर कब्जा न कर लिया हो। शहर के प्रमुख बाजारों से लेकर रोड का ही यही हाल है। रात में इन्हीं मार्गों से निकलेंगे तो बहुत चौड़े दिखाई देंगे। दिन में ये यही मार्ग सिकुड़ जाते हैं। इस पर जिला प्रशासन को गहनता से मंथन कर समाधान तलाशना होगा। रामघाट रोड सबसे अधिक चौड़े मार्गों में शामिल है। लेकिन अब ये भी सिकुड़ता जा रहा है। मीनाक्षी पुल से लेकर क्वार्सी चौराहे तक बुरा हाल है। पहले क्वार्सी चौराहे से पीएसी तक यह मार्ग खुला-खुला दिखता था, अब ये भी अतिक्रमण में सिसकने लग गया है। क्वार्सी चौराहे को सुंदर बनाने के लिए अफसरों ने जनता को खूब सब्जबा,दिखाए लेकिन हुआ कुछ नहीं । अतिक्रमण को हटाए बगैर यहां कुछ भी नहीं हो सकता। इस पर काम होना जरूरी भी है।

सामने आया असली चेहरा

जिले भर में किस तरह ट्रामा सेंटर के नाम पर खेल चल रहा था? कैसे मरीजों को जाल में फंसाया जा रहा था। हकीकत सामने आ गई है। सबकुछ जानकर भी स्वास्थ्य विभाग इस ओर से आंखे बंद किए हुए था। दैनिक जागरण ने सामाजिक सरोकार के तहत अभियान चलाया तो परतें खुलती चलीं गईं। किसी के पास रजिस्ट्रेशन नहीं मिला तो कोई ट्रामा सेंटर के मानक पूरे नहीं कर रहा था। अस्पताल संचालकों ने भी अपनी गलती मानी। बोर्ड से ट्रामा सेंटर का शब्द ही हटा दिया। हालांकि, धंधेबाजी अभी पूरी तरह बंद नहीं हुई है। वजह, इन्हें मिलने वाला विभागीय संरक्षण है। विभाग ने नोटिस जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। हैरानी की बात तो ये भी है कि सीएमओ को अपनों से सही ही जानकारी नहीं मिलती। अगर ऐसा होता तो ट्रामा सेंटर इस तरह नहीं फलते-फूलते। मेडिकल एसोसिएशन को भी मंथन करने की जरूरत है।