जागरण संवाददाता, अलीगढ़ : उम्र 64 वर्ष मगर हिम्मत हिमालय सी। कभी थके नहीं, कभी रुके नहीं। हम बात कर रहे हैं समाजसेवी कालीचरन की। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ लोगों को दिलाने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। खेती-बाड़ी से जो कुछ खर्चा निकल जाता, वही उनकी आमदनी का जरिया है। कभी पैसे कमाने की कोई ख्वाहिश नहीं रही। बस, लोगों का काम हो जाए, यही उनके लिए सबसे बड़ी 'दौलत' है। सैकड़ों लोगों के राशनकार्ड बनवाए तो दर्जनों को आवास दिलवाया। सुबह घर से निकलते तो देरशाम तक ही लौटते। कालीचरन की सरकारी कार्यालयों में ऐसी पहचान बन गई कि इन्हें देखते ही अधिकारी तुरंत काम कर देते।

कालीचरन हरदुआगंज क्षेत्र के गांव चंगेरी के रहने वाले हैं। आठवीं तक पढ़ाई की है। छह बीघे खेती है, उसी से खर्चा चलता है। दो बेटे हैं, वो हरदुआगंज में अपना काम करते हैं। वर्ष 1975 की बात है, तब उनकी उम्र 22 वर्ष थी। गांव में एक व्यक्ति का राशनकार्ड नहीं बन रहा था। कालीचरन बताते हैं उन्होंने साइकिल उठाई और गांव से 20 किमी दूर जिला आपूर्ति कार्यालय पहुंच गए। वहां एक अधिकारी ने रौब से पूछा, क्या है? कालीचरन ने कहा कि साहब राशनकार्ड बनवाने आया था। अधिकारी ने कहा कि कल आकर ले जाना। दूसरे दिन कालीचरन राशनकार्ड लेकर गांव पहुंच गए, तो सब बोलने लगे कमाल है 'नेताजी' काम हो गया। उसी दिन से कालीचरन 'नेताजी' के रूप में चर्चित हो गए और उन्होंने गांव के लोगों का काम कराना शुरू कर दिया। कालीचरन कहते हैं कि गांव के लोगों के बीच जो तारीफ मिली, उसके बाद कभी काम करने में मन ही नहीं रमा। लोग राशनकार्ड, वृद्धा व विकलांग पेंशन, आवास योजना, शादी अनुदान आदि काम के लिए उनसे संपर्क करने लगे। सुबह उठते ही गांव में प्रतिदिन दो-चार लोग आ जाया करते थे। फिर, कालीचरन साइकिल से अलीगढ़ के लिए निकल पड़ते थे। यहां पर कलक्ट्रेट, विकास भवन, नगर निगम आदि कार्यालयों में अधिकारियों से मिलना शुरू हो जाया करता था।

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काम होने पर मिट जाती थकान

कालीचरन कहते हैं कि पूरा दिन कार्यालय के चक्कर लगाते थे। एक भी काम हो जाया करता था तो मानों पूरे दिनभर की थकान मिट जाती थी। ऊंट गिरी गांव में इंदिरा आवास के तहत नौ लोगों को आवास के लिए मदद दिलवाई। कमालपुर गांव में एक दर्जन से अधिक लोगों के घरों में शौचालय बनवाया, पांच लोगों को आवास के लिए मदद दिलाया। कालीचरन कहते हैं कि वृद्धा, विकलांग व विधवा पेंशन कितने लोगों के बना दिए उन्हें खुद नहीं याद। हां, 1980 से चंगेरी गांव के आसपास के गांवों में जाकर लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में बताना शुरू कर दिया। इससे भी लोगों के बीच पहचान बन गई और लोग काम लेकर आने लगे।

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64 साल की उम्र में भी सक्रिय

64 की उम्र में आकर कालीचरन साइकिल तो नहीं चला पाते, मगर लोग टेंपो आदि से सरकारी कार्यालय लेकर जाते हैं। कालीचरन कहते हैं कि लगातार 42 वर्ष से कार्यालयों में आने से उन्हें काम के लिए कोई मनाही नहीं करता है। लोगों की काम की बदौलत ही उनकी सक्रियता बनी रहती है, वरना उनके उम्र के लोग अब लाठी लेकर चलते हैं।

Posted By: Jagran

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