आगरा, प्रभजोत कौर। आज वर्ल्ड रैबीज डे है। इस बार की थीम- वन हैल्थ, जीरो डैथ्स हैं। यह थीम आगरा में आकर फेल हो जाएगी क्योंकि यहां का सरकारी सिस्टम ही कुत्तों और बंदरों की समस्या को खत्म करने में फेल साबित हो गया है। स्थिति यह है कि जिला अस्पताल में हर रोज एंटी रैबीज के इंजेक्शन लगवाने के लिए 400 मरीज पहुंचते हैं, वहीं नगर निगम के पास आवारा कुत्ताें को पकड़कर उनकी नसबंदी कराने की जिम्मेदारी है, उसी के गेट पर कुत्तों की फौज अधिकारियाें को चुनौती देती नजर आती है।

स्टाफ पर हर महीने तीन लाख खर्च, कुत्ते पकड़े 17

नगर निगम के पशुपालन विभाग में अधिकारी और कर्मचारियों की लंबी फौज है। स्टाफ के वेतन सहित अन्य पर हर माह तीन लाख रुपये खर्च होते हैं, जबकि हर माह महज 17 कुत्ते पकड़े जाते हैं। पिछले एक साल में केवल 205 कुत्ते पकड़े गए हैं। दो सालों में केवल 441 कुत्तों की नसबंदी हुई है, जबकि शहर में कुत्तों की संख्या लगभग 60 हजार है। पिछले दिनों शहर में कुत्तों और बंदरों के हमले बढ़ने के बाद नगर निगम ने संस्थाओं को कुत्ता पकड़ने की जिम्मेदारी दी है।

सात करोड़ से होगी कुत्ताें की नसबंदी

यह संस्थाएं शहर भर से 60 हजार कुत्तों को पकड़ कर नसबंदी करेंगी और इसमें सात करोड़ रुपये खर्च होंगे। जुलाई माह में भी नगर निगम के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. अजय कुमार सिंह ने निर्देश दिए थे कि सौ वार्डों को चार जोन में बांटा जाए। हरीपर्वत, छत्ता, लोहामंडी और ताजगंज जोन में 25-25 वार्ड शामिल होंगे। हर वार्ड में एक संस्था को कुत्तों के पकड़ने और नसबंदी की जिम्मेदारी दी जाएगी। हर दिन तीस से चालीस कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य था। आवारा कुत्तों के लिए अलग से आश्रय घर भी बनना था। पर अभी तक यह निर्देश भी कागजी ही रह गए हैं।

बंदराें के बीच परेशान युवक। 

बंदरों के बंध्याकरण का भी बना है प्रस्ताव

लंबे समय से आगरा में बंदरों को पकड़कर जंगलों में छोड़े जाने पर विचार चल रहा था। कई बार प्रयास भी हुए लेकिन किसी न किसी कारण के चलते ठंडे बस्‍ते में चले गए। अब एक बार फिर कवायद शुरू हो रही है। इसके लिए नगर निगम ने वन विभाग से बंध्याकरण की अनुमति मांगी है। अनुमति मिलने के बाद इस प्रस्ताव पर काम शुरू हो जाएगा। शहर में ताजमहल, सिकंदरा, एसएन मेडिकल कालेज, बेलनगंज, रावतपाड़ा, दरेसी, किनारी बाजार, जामा मस्जिद, आगरा किला समेत कई क्षेत्रों में बंदरों का आतंक है।

रेस्क्यू सेंटर योजना की नहीं परवान

2019 में कीठम स्थित भालू संरक्षण केंद्र और चुरमुरा स्थित हाथी देखभाल केंद्र पर रेस्क्यू सेंटर बनाने की योजना थी। जो अब तक पूरी नहीं हो पाई है। बंदरों को पकड़ने के लिए वाइल्ड लाइफ एसओएस ने प्रोजेक्ट तैयार किया था, जिसमें 55 करोड़ रुपये खर्च होने थे। शहर में बंदरों की गणना वन विभाग ने छह साल पहले कराई थी। तब इनकी संख्या लगभग 18 हजार थी। वर्तमान में शहर में बंदरों की अनुमानित संख्या 30 हजार है।

जिला अस्पताल में रहती है एंटी रैबीज इंजेक्शन की किल्लत

जिला अस्पताल में पर्याप्त मात्रा में एंटी-रेबीज इंजेक्शन नहीं हैं। इसके चलते जिला अस्पताल में हंगामा होता है। इंजेक्शन की कमी के चलते जिला अस्पताल में आर्थिक रूप से सक्षम लोगों से निजी अस्पतालों में इंजेक्शन लगवाने की अपील की जाती है।अस्पताल के सीएमएस डा. एके अग्रवाल कई बार इंजेक्शनों की कमी के चलते सामाजिक संगठनों से मदद की अपील कर चुके हैं। सामाजिक संस्था द्वारा कई बार इंजेक्शन दान में दिए गए हैं। शासन से मांग के अनुरूप एंटी रैबीज इंजेक्शन नहीं मिलते हैं।

कुत्ताें और बंदराें से गयी जान

हाल ही में आवारा कुत्ताें के हमले से एक 11 साल की बच्ची की जान सिकंदरा में चली गयी। वहीं दो साल पहले घटिया आजम खां क्षेत्र में मकान बनवा रहे व्यक्ति की जान बंदराें के हमले से जा चुकी है। दयालबाग में पुष्पांजलि बाग कॉलोनी में आवारा कुत्ताें का आतंक है। सामान को नुकसान पहुंचाने के अलावा वे बच्चाें पर हमला कर रहे हैं। बीते पखवाड़े में ताजमहल पर तमाम पर्यटकाें को बंदर अपना निशाना बना चुके हैं।  

Edited By: Prateek Gupta

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