आगरा, जागरण संवाददाता। जीवों में संतानोत्पत्ति एक प्राकृतिक एवं महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। पशु पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां अपनी वंशवृद्धि की प्रक्रिया को अपने अपने तरीकों से पूर्ण करते हैं। अगर पक्षियों की बात करें तो जितनी प्रजातियां हैं उनके घौंसले निर्माण से लेकर प्रजनन के लिए साथी का चुनाव और चूजों के पालन पोषण की अलग अलग विशेषताएं हैं। कम होते वृक्ष, सिकुड़ते वेटलैंड्स , घटते जंगल, वायु व जल प्रदूषण और मनुष्यों के हस्तक्षेप के कारण पक्षियों की प्रजनन प्रक्रिया भी प्रभावित हुई है। पक्षियों को प्रजनन संबधी अनुकूल परिस्थितियों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा हैं। आगरा- मथुरा की सीमा पर स्थित जोधपुर झाल के संरक्षण और उचित रख रखाव के फलस्वरूप जोधपुर झाल पर भारत में पाई जाने वाली वीवर की चार में से तीन प्रजातियां प्रजनन कर रही हैं।

वीवर की चार में से तीन प्रजातियां प्रजनक निवासी है जोधपुर झाल पर

बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डवलपमेंट सोसाइटी के अध्यक्ष व पक्षी विशेषज्ञ डॉ केपी सिंह के अनुसार भारत में वीवर की चार प्रजातियां पाई जाती हैं।

1. बया वीवर ( काॅमन बया या इंडियन वीवर )

2. ब्लैक ब्रेस्टेड वीवर ( ब्लैक-थ्रोटेड वीवर )

3. स्ट्रीक्ड वीवर 

4. फिन्स वीवर ( फिन्स बया या यलो वीवर )

जोधपुर झाल पर वीवर की तीन प्रजातियां बया बीवर, ब्लैक-ब्रस्टेड बीवर और स्ट्रीक्ड बीवर प्रजनक निवासी हैं। वीवर अपने भोजन में अनाज , बीज और कीड़ो को खाते हैं। भारत की वीवर की चारों प्रजातियों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची IV में संरक्षित और सूचीबद्ध किया गया है।

बया वीवर

इसका वैज्ञानिक नाम प्लोसियस फिलिपिनस है। यह भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है। नर बया का सिर व पेट पीले रंग का होता है। इन पक्षियों के झुंड घास के मैदानों, खेती वाले क्षेत्रों, झाड़ी वाले स्थानों में पाए जाते हैं। इनके घौंसले लटके हुए रिटॉर्ट के आकार के होते हैं।

ब्लैक-ब्रेस्टेड वीवर

इसे बंगाल वीवर या ब्लैक-थ्रोटेड वीवर के नाम से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम प्लोसियस बेंघालेंसिस है। यह भारतीय उपमहाद्वीप के नदी वाले मैदानी भागों में पाए जाते हैं। नर के गले से लेकर ब्रेस्ट तक रंग काला होता है और सर पीले रंग का होता है।

स्ट्रीक्ड वीवर

इसका वैज्ञानिक नाम प्लोसियस मन्यार है। यह दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के भारत , बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान, सिंगापुर, श्रीलंका आदि देशों में पाया जाता है। इसकी उपस्थिति थाईलैंड, वियतनाम, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में भी रिकार्ड की गई है। नर का सर पीला और अंडरपार्ट्स पर काले रंग के स्ट्रीक्ड होते हैं।

वीवर के घौसलों के निर्माण की प्रक्रिया होती है अद्भुत

जोधपुर झाल पर वीवर की प्रजातियों की ब्रीडिंग का अध्ययन कर रहे पक्षी विशेषज्ञ डाॅ केपी सिंह के अनुसार वीवर प्रजाति का प्रजनन काल जून से सितंबर तक चलता है। वीवर अपने घौंसले जिस तरह बनाते हैं इस कारण इन्हे बुनकर पक्षी भी कहा जाता है। वीवर की तीनों प्रजातियां कोलोनियल नेस्टिंग करती हैं। वेटलैंड्स, नहरें और तालाब के पास के स्थलीय वृक्ष घौंसले बनाने के आदर्श स्थल हैं। वीवर पाम, खजूर , मूंज , कांस , टाइफा घास अथवा धान की लंबी पत्तियों को घागे की तरह पट्टी काटकर आपस में उन्हे बुनते हैं। केवल नर वीवर घोंसले का निर्माण करते हैं। मादाओं द्वारा आंतरिक सज्जा की जाती है। जिसमें मिट्टी का भी इस्तेमाल किया जाता है। घोंसले निर्माण में मानसून व अन्य शत्रु पक्षियों से सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाता है।

बया वीवर के घोंसले

यह अपने घौंसले अधिकतर कांटेदार पेड़ो पर बनाते हैं। वेटलैंड्स के नजदीक एवं नहरों के किनारे यह घोंसले बनाना पसंद करते हैं। इनके घोंसले देशी बबूल, खजूर, नारियल, बेर, पाम, सिरिस आदि पेड़ो पर देखे जाते हैं। इनके घोंसले पेन्डुलम की तरह पेड़ो की टहनियों पर लटके होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से नहर या तालाब के पानी वाली जगह के उपर घोंसले टहनियों पर लटके होते हैं । घोंसले बुनने में प्रयुक्त एक पट्टी की लंबाई 20 से 60 सेमी तक होती है। इनमें इंट्रास्पेसिफिक ब्रूडिंग पाई जाती है।

ब्लैक-ब्रस्टेड वीवर के घोंसले 

इनके घोंसले कुछ छोटे होते हैं। सामान्य रूप से प्रवेश ट्यूब भी छोटी होती है। यह अपने घौसलों के लिए दलदली स्थल की टाइफा घास , ईख , मूंज या कांस का चयन करते हैं। मादा तीन से चार अंडे देती हैं।

स्ट्रीक्ड वीवर के घोंसले 

यह वीवर भी मूंज की पत्तियों को मिलाकर बांधते हैं और उन पर अन्य वीवर की तरह लटकते हुए घोंसलो का निर्माण करते हैं। टाइफा घास पर भी इनके घोंसले रिकार्ड किए गए हैं।

 

Edited By: Tanu Gupta