यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 21, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Sawan 2022: रहस्य से भरी है कासगंज के सोरों की हरिपदी गंगा, अस्थि विसर्जन के बाद हो जाती हैं 'गायब'
Sawan 2022 सोरोंजी को तीर्थस्थल का दर्जा मिला है। यहां गंगाजल लेने के लिए सावन में कांवड़ियों की भारी भीड़ ...और पढ़ें

आगरा, जागरण टीम। Sawan 2022: दरिया हो या सागर शरीर की हड्डियों को पानी में विलीन होने में एक लंबा अरसा लग जाता है। यकीन न हो तो किसी भी नदी में तर्पण के बाद इंसान की राख से बीनी गईं हड्डियों को पानी में बहाने के बाद आप उन्हें देख सकते हैं।
मगर, ब्रज में एक जल स्त्रोत ऐसा भी है, जिसमें तीन दिन में अस्थियां पानी में विलीन हो जाती हैं। यह है सोरों स्थित हरि की पौड़ी जहां पर पितृ पक्ष में मोक्ष की गंगा बहती है।
हरिपदी गंगा में होती हैं अस्थि विसर्जित
कासगंज जिले के सोरों सूकर क्षेत्र के अन्तर्गत जो कुंड (हरिपदी गंगा) है, यह वही स्थान है, जहां भगवान श्री वाराह ने स्वर्गारोहरण किया था और तभी से इस कुंड में मृत्यु के पश्चात अस्थियों का विसर्जन किया जाता है। सोरों सूकर क्षेत्र को मोक्ष प्रदान करने वाले तीर्थ के रूप में माना जाता है। तीर्थ की ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण।
पितृ पक्ष में और बढ़ जाती है हरिपदी की प्रासंगिकता
सोरों की हरि की पौड़ी की प्रासंगिकता पितृ पक्ष में और ज्यादा बढ़ जाती है। हरिपदी गंगा में अविरल-अविराम, मोक्ष की धारा बहती है, जिसमें 72 घंटे में अस्थियां जल में घुल जाती हैं। ऐसा क्यों होता है यह पता लगाने के लिए कई शोध हुए, मगर इसका राज कोई न जान सका।
कोठीबाल आड़तिया महाविधालय के हिन्दी प्रवक्ता एवं हरि की पौड़ी पर शोध करने वाले राधाकृष्ण दीक्षित कहते हैं कि हरिपदी गंगा के जल को लेकर कई शोध हो चुके हैं परंतु इसका राज पता नहीं चला है। यदि यह इतनी जल्दी न गलतीं तो यहां बहुत ज्यादा अस्थियां आने की वजह से उनका पहाड़ लग जाता। वराह पुराण में हरि की पौड़ी के जल में अस्थियां विलीन होने की बात कही है।
सोरों का धार्मिक महत्व
हिरण्याक्ष दैत्य बड़ा ही बलवान था। देवताओं पर चढ़ाई करके देवताओं को जीत लिया। लोकों का अधिपति बनकर बैठ गया। देवता छिप गये। भगवान विष्णु की आराधना करने लगे। तब भगवान वाराह का रूप धारण इसी शूकर क्षेत्र में ब्रह्माजी की नासिका से प्रकट हुए। भगवान वारह ने पाताल में जाकर दैत्य से युद्ध कर उसका वध किया। पृथ्वी का भार हरण किया।
भगवान ने देह का परित्याग इसी क्षेत्र में किया
भगवान अपने अवतार का उद्देश्य पूरा करने के बाद निज देह का परित्याग इसी सोरों शूकर पुण्य क्षेत्र में किया। यहीं पर विष्णु के अवतार भगवान वाराह का मंदिर है।
सीता ने यहां पकाया भोजन
सीता की रसोई है, जिसके बारे में मान्यता है कि सीता जी ने यहां भोजन पकाया था। सूर्य कुंड है, जिसके पानी से खीर बनाने की परंपरा है। तुलसीदास की ससुराल है, जहां सांप को रस्सी समझकर छत पर चढ़ गए थे। धर्म क्षेत्र के जानकारों के अनुसार सृष्टि का उद्गम स्थल सोरों तीर्थनगरी को ही माना जाता है।
ऐसे पहुंचे सोरों सूकर क्षेत्र
उत्तर प्रदेश के कासगंज जनपद मुख्यालय से करीब 16 किलोमीटर दूर विख्यात तीर्थ स्थल सोरों सूकर क्षेत्र है। यहां पहुंचने के लिए बस और रेल मार्ग दोनों ही साधन हैं। तीर्थनगरी सोरों के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु राजस्थान, मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आते हैं।