आगरा, रसिक शर्मा। भक्त का प्रेम भगवान को इंसान बनने पर विवश कर देता है। सुनसान सी स्थली के बिना दरवाजे के बने छोटे से मंदिर में विराजमान गिरिराज शिला पर श्रद्धा और दूध की बूंदे गिरने लगी तो वक्त ने गगन चुम्बी इमारत खड़ी कर दी और आस्था का समंदर मचलने लगा। तन्हा सी दिखने वाली दान की घाटी में ब्रम्हांड का वैभव नजर आने लगा। इतिहास का यह अद्भुत नमूना कदम दर कदम सौंदर्य और आस्था का इतिहास रचता चला गया।

धार्मिक इतिहास के पन्ने ऐसे अनूठे प्रेम के लम्हों को सहेजे हुए हैं। समर्पण भरे प्रेम के दिव्य पलों के संग्रह से सुसज्जित ब्रज वसुंधरा का इतिहास राधाकृष्ण के साथ गोपियों की प्रेम छलकाती भक्ति को दर्शाता है। बृजभूमि के कण कण में द्वापर युगीन रहस्यमयी लीलाएं छिपी हैं। मथुरा से 21 किमी की दूरी पर स्थित कान्हा के स्वर्णिम इतिहास का गवाह पर्वतराज गोवर्धन की धरा प्राकृतिक सौंदर्य और भक्ति की अनूठी मिशाल है।

1957 में मंदिर की नींव रखी गई तो रोशनी के लिए सिर्फ एक लालटेन लटकी रहती थी। धीरे धीरे मंदिर विशाल स्वरूप में परिवर्तित होने लगा।

वक्त दर वक्त बड़ा वैभव

करीब चार दशक पूर्व प्रभु पर चुनिंदा पोशाक थीं वक्त के बदलते परिदृश्य में 1998 में प्रभु की मीनार पर स्वर्ण कलश और स्वर्ण ध्वज प्रभु के वैभव का यशोगान कर रहा है। 2003 में चांदी के बने दरवाजे पर नक्काशी नज़रों को ठहरने पर मजबूर कर देती है। 2005 में 51 किलो चांदी का छत्र प्रभु का गुणगान करने लगा और 2013 में चांदी के सिंघासन पर प्रभु विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देने लगे। स्वर्ण आभूषण युक्त श्रृंगार प्रभु के वैभव को दर्शाकर भक्तों को सम्मोहित कर अपलक निहारने पर मजबूर कर देता है।

स्थली यूं हुई विशेष

मथुरा अलवर मार्ग पर गोवर्धन में स्थापित यह मंदिर भक्तों के लिए मन्नतों का दरबार माना जाता है। धार्मिक इतिहास खंगालें तो ब्रज गोपियां इसी रास्ते से मथुरा के राजा कंस को माखन का 'कर' चुकाने जाती थीं। कन्हैया इसी स्थली पर ग्वाल बाल के साथ माखन और दही का दान लेते थे। प्रेम के वशीभूत भगवान जब खुद भक्तों से दान मांगने पर विवश हो गए, उन लम्हों का शब्दों में वर्णन करने में लेखनी भी नतमस्तक नजर आती है। कान्हा की दानलीला मनुहार, प्रेम और खींचातानी आदि भावमयी लीलाओं का अनूठा संग्रह है। भगवान श्रीकृष्ण की इस प्रेमभरी दिव्य लीला का वर्णन धार्मिक ग्रंथों में अंकित है। कवियों ने कल्पना से काव्य की रसधार बहाई तो ऋषि मुनियों की गाथाओं से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। दानकेलि कौमुदी ग्रन्थ में इस लीला का वर्णन विस्तार से किया गया है तो दिल को छू लेने वाली लीला को गौड़ीय सम्प्रदाय के लोग भक्ति रस के गीतों में करते हैं। गोपी और कृष्ण के इन अद्भुत पलों को शब्द देकर कवियों ने तो काव्य का सागर बना दिया है। प्रभु की इस लीला के कारण ही इस स्थली को दानघाटी के नाम से जाना जाता है तथा मंदिर में विराजमान प्रभु को दानघाटी गिरिराज नाम दिया गया है।

श्रृंगार और सेवा से जीवंत करते लीला

सेवायत रामेश्वर पुरोहित दानलीला की कल्पना को सेवाभाव से साकार करने का प्रयास करते हैं। प्रभु को माखन और दही की याद न सताए इसलिए प्रभु को सुबह दूध दही शहद आदि से रोजाना पंचामृत अभिषेक कराया जाता है। प्रभु के बालभोग में माखन मिश्री, मीठा दूध का रोजाना भोग लगाया जाता है। दोपहर की बेला में प्रभु को आभूषण युक्त पोशाक धारण कराई जाती है। प्रभु के स्वाद के लिए मंदिर में ही विभिन्न व्यंजन तैयार किए जाते हैं।

दिव्यता में भव्यता का मिलन

तलहटी के भव्य मंदिरों में शुमार दानघाटी मंदिर का सौंदर्य नज़रों को ठहरने पर मजबूर कर देता है। यूं तो गिरिराज प्रभु की इक्कीस किमी लंबी परिक्रमा लोग कहीं से भी शुरू कर देते हैं परंतु अमूमन भक्त इसी मंदिर से परिक्रमा प्रारम्भ करते हैं। दानघाटी गिरिराज पर रोजाना लाखों क्विंटल दूध चढ़ता है। महीना में तकरीबन पंद्रह दिन प्रभु का फूल बंगला सजता है तथा छप्पन भोग का आयोजन होता है। मंदिर की ऊंची इमारतें और प्रांगण रंग बिरंगी रोशनी से झिलमिलाता रहता है। रोजाना होते उत्सवों के कारण इसे नित्य उत्सव भूमि की संज्ञा प्राप्त है। 

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