आगरा, तनु गुप्‍ता। पांच दिन के रोशनी के पर्व का प्रमुख दिन आज यानि 27 अक्‍टूबर को है। देश के हर कोने में सांझ ढले दीप मालिकाएं धरा पर कोटि सितारों के जैसी दिखेंगी तो हर मन में श्रद्धा का वास होगा। यूं तो भारत देश को त्‍योहारोंं का देश कहा जाता है। हर दिन ही यहां कोई न कोई विशेष पर्व होता है। यहां का हर वार खास होता है लेकिन दीपावली एक ऐसा त्‍योहार है जिसे पूरी दुनिया में ही विशेष आकर्षण मिलता है। दीपावली पर दीपकों की चटख रोशनी, पटाखाेें की आवाज और चमक और मिठाइयों की मिठास। कई दफा नई पीढ़ी अपने दिमाग में इन सभी के संयोजन के महत्‍व को जानना चाहती है। इस बाबत धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी कहते हैं कि वर्ष भर के प्रमुख त्‍योहारों में सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण दीपावली का त्‍योहार है। पांच दिन के इस त्‍योहार का हर दिन खास है और इन दिनों प्रयोग की जाने वाली सामग्री भी महत्‍वपूर्ण। इन सभी के पीछे अध्‍यात्‍म का ज्ञान छुपा हुआ है। जो एक बार समझ ले सही मायने में दीपावली उसकी है।

दीपक का महत्व

पंडित वैभव जोशी कहते हैं कि तेल के दीपक को प्रज्ज्वलित करने के लिए बत्ती को तेल में डुबाना पड़ता है, परन्तु यदि बत्ती पूरी तरह से तेल में डूबी रहे तो यह जलकर प्रकाश नहीं दे पाएगी, इसलिए उसे थोड़ा सा बाहर निकाल के रखते हैं। हमारा जीवन भी दीपक की इसी बत्ती के सामान है, हमें भी इस संसार में रहना है फिर भी इससे अछूता रहना पड़ेगा। यदि हम संसार की भौतिकता में ही डूबे रहेंगे तो हम अपने जीवन में सच्चा आनंद और ज्ञान नहीं ला पाएंगे। संसार में रहते हुए भी, इसके सांसारिक पक्षों में न डूबने से हम, आनंद एवं ज्ञान के द्योतक बन सकते हैं। जीवन में ज्ञान के प्रकाश का स्मरण कराने के लिए ही दिवाली मनाई जाती है। दिवाली केवल घरों को सजाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन के इस गूढ़ रहस्य को उजागर करने के लिए भी मनाई जाती है। हर दिल में ज्ञान और प्रेम का दीपक जलाएं और हर एक के चेहरे पर मुस्कान की आभा लाएं। प्रकाश की पंक्तियांं दीपावली भी कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘प्रकाश की पंक्तियांं’। जीवन में अनेक पक्ष एवं पहलू आते हैं और जीवन को पूरी तरह से अभिव्यक्त करने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम उन सब पर प्रकाश डालें। प्रकाश कि ये पंक्तियांं हमें याद दिलाती हैं कि जीवन के हर पहलू पर ध्यान देने और ज्ञान का प्रकाश डालने की जरूरत है। प्रत्येक मनुष्य में कुछ अच्छे गुण होते हैं और हमारे द्वारा प्रज्ज्वलित हर दीपक, इसी बात का प्रतीक है। कुछ लोगों में सहिष्णुता होती है, कुछ में प्रेम, शक्ति, उदारता आदि गुण होते हैं जबकि कुछ लोगों में, लोगों को जोड़ के रखने का गुण होता है। हमारे भीतर के ये छिपे हुए गुण, एक दीपक के समान है। केवल एक ही दीपक प्रज्ज्वलित कर के संतुष्ट न हों जाएंं। हजारों दीपक जलाएं। अज्ञानता के अन्धकार को दूर करने के लिए हमें अनेक दीपक जलाने की आवश्यकता है। ज्ञान के दीपक को जला कर एवं ज्ञान अर्जित कर के हम अपने अस्तित्व के सभी पहलुओं को जागृत कर देते हैं। जब ये प्रकाशित एवं जागृत हो जाते हैं, तब ही दिवाली है।

पटाखे, मिठाई एवं उपहार

दीपावली में पटाखे जलाने का भी एक गूढ़ अर्थ है। जीवन में अक्सर अनेक बार हम भावनाओं, निराशा एवं क्रोघ से भरे पड़े होते हैं, पटाखों की तरह फटने को तैयार। जब हम अपनी भावनाओं, लालसाओं, विद्वेष को दबाए रहते हैं तब ये एक विष्फोट बिंदु तक पहुच जाते हैं। पटाखों को जलाना या विस्फोट करना, दमित भावनाओं को मुक्त करने के लिए हमारे पूर्वजों द्वारा बनाया गया एक मनोवैज्ञानिक अभ्यास है। जब हम बाहरी दुनिया में एक विस्फोट देखते हैं तो अपने भीतर भी एक इसी प्रकार की, समान संवेदना महसूस करते हैं। विस्फोट के साथ ही बहुत सा प्रकाश फ़ैल जाता है। जब हम अपनी इन भावनाओं से मुक्त होते हैं तो गहन शांति का उदय होता है।

दिवाली के दौरान एक और परंपरा है, मिठाइयों और उपहारों का आदान-प्रदान। एक-दूसरे को मीठा और उपहार देने का अर्थ है, भूतकाल के सभी खटास को मिटा कर आने वाले समय के लिए मित्रता को नवजीवन प्रदान करना। ज्ञान और प्रकाश कोई भी उत्सव सेवा भावना के बिना अधूरा है। ईश्वर से हमें जो भी मिला है, वह हमें दूसरों के साथ भी बांटना चाहिए क्योंकि जो बांंटना है, वह हमें भी तो कहीं से मिला ही है, और यही सच्चा उत्सव है। आनंद एवं ज्ञान को फैलाना ही चाहिए और ये तभी हो सकता है, जब लोग ज्ञान में साथ आएंं।

दीपावली का संदेश

पंडित वैभव जोशी के अनुसार दीपावली का अर्थ है वर्तमान क्षण में रहना, अतः भूतकाल के पश्चाताप और भविष्य की चिंताओं को छोड़ कर इस वर्तमान क्षण में रहें। यही समय है कि हम साल भर की आपसी कलह और नकारात्मकताओं को भूल जाएंं। यही समय है कि जो ज्ञान हमने प्राप्त किया है उस पर प्रकाश डाला जाए और एक नई शुरुआत की जाए। जब सच्चे ज्ञान का उदय होता है, तो उत्सव को और भी बल मिलता है।

अध्यात्मिक ज्ञान और दिवाली

आत्मा का स्वाभाव है उत्सव। प्राचीन काल में सधु- संत हर उत्सव में पवित्रता का समावेश कर देते थे ताकि विभिन्न क्रिया-कलापों की भाग-दौड़ में हम अपनी एकाग्रता या फोकस न खो दें। रीति-रिवाज़ एवं धार्मिक अनुष्ठान ईश्वर के प्रति कृतज्ञता या आभार का प्रतीक ही तो हैं। ये हमारे उत्सव में गहराई लाते हैं। दिवाली में परंपरा है कि हमने जितनी भी धन- संपदा कमाई है उसे अपने सामने रख कर प्रचुरता (तृप्ति) का अनुभव करें। जब हम अभाव का अनुभव करते हैं तो अभाव बढ़ता है, परन्तु जब हम अपना ध्यान प्रचुरता पर रखते हैं तो प्रचुरता बढ़ती है। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में कहा है, धर्मस्य मूलं अर्थः अर्थात सम्पन्नता धर्म का आधार होती है।

जिन लोगों को अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है, उनके लिए दीवाली वर्ष में केवल एक बार आती है, परन्तु ज्ञानियों के लिए हर दिन और हर क्षण दीवाली है। हर जगह ज्ञान की आवश्यकता होती है। यहांं तक कि यदि हमारे परिवार का एक भी सदस्य दुःख के तिमिर में डूबा हो तो हम प्रसन्न नहीं रह सकते। हमें अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के जीवन में, और फिर इसके आगे समाज के हर सदस्य के जीवन में, और फिर इस पृथ्वी के हर व्यक्ति के जीवन में, ज्ञान का प्रकाश फैलाने की आवश्यकता है। जब सच्चे ज्ञान का उदय होता है, तो उत्सव को और भी बल मिलता है।

यजुर्वेद में कहा गया है, तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु यानि हमारे इस मन से सद इच्छा प्रकट हो। यह दीवाली ज्ञान के साथ मनाएंं और मानवता की सेवा करने का संकल्प लें। अपने ह्रदय में प्रेम का, घर में प्रचुरता का दीपक जलाएं। इसी प्रकार दूसरों की सेवा के लिए करुणा का, अज्ञानता को दूर करने के लिए ज्ञान का और ईश्वर द्वारा हमें प्रदत्त उस प्रचुरता के लिए कृतज्ञता का दीपक जलाएं।

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त

18:42 से 20:11

प्रदोष काल- 17:36 से 20:11

वृषभ काल- 18:42 से 20:37

अमावस्या तिथि आरंभ- 12:23 (27 अक्तूबर)

अमावस्या तिथि समाप्त- 09:08 (28 अक्तूबर)

मां लक्ष्मी को ऐसे करें प्रसन्न

मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के तरीके बहुत आसान हैं, लेकिन ज्यादतर लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती है। मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए शास्त्रों में कई उपाय भी दिए गए हैं, जिन्हें करके आसानी से मां की कृपा पाई जा सकती है। ईशान कोण में चौकी रखकर उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएंं। गंगाजल छिड़क कर माता लक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित करें। भगवान जी को नए वस्त्र, अलंकार, आभूषण, पुष्प माला, जनेऊ धारण कराएंं। चंदन एवं अक्षत से तिलक करें। पांच फल, पांच मेवा, पांच तरह की मिठाई, खीली, बताशे, खिलौने का भोग लगाएंं। गणेश जी को दुर्वा, गणेंली, लौंग इलायची, पान सुपारी अर्पित करें। माता लक्ष्मी के दायीं ओर घी का तथा बायी ओर चमेली के तेल का दीपक जलाएंं। धूप दीप कपूर से लक्ष्मी एवं गणेश जी की आरती करें। चांदी के सिक्के, कलम कॉपी आदि की पूजा करें। रात्रि में कुबेर पूजन, श्री सूक्त का पाठ मंत्र जाप आदि करना सिद्धिप्रद रहेगा।

रात में की जाती है लक्ष्मी पूजा

दीपावली पर रात में लक्ष्मी पूजा करना ज्यादा शुभ माना जाता है। इस वजह से अधिकतर लोग देर रात लक्ष्मी पूजा करते हैं। इस संबंध में मान्यता है कि जो लोग दीपावली की रात जागकर लक्ष्मी पूजा करते हैं, उनके घर में देवी लक्ष्मी का आगमन होता है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। महालक्ष्मी के महामंत्र ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद् श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मयै नम: का कमलगट्टे की माला से कम से कम 108 बार जाप करेंगे तो आपके ऊपर मां लक्ष्‍मी की कृपा बनी रहेगी।

कई वर्षों के बाद बन रहा दुर्लभ योग

इस साल दीपावली पर तिथियों को लेकर दुर्लभ योग बन रहे हैं। 27 अक्टूबर को भी सुबह रूप चौदस रहेगी और प्रदोष कालीन अमावस्या रात में होने से दीपावली 27 को ही मनेगी। भागवताचार्य पंडित चरित जी महाराज के अनुसार इस वर्ष 27 अक्टूबर को सूर्योदय कालीन चतुर्दशी तिथि है जो दोपहर 12.23 बजे तक रहेगी। इसके बाद में अमावस्या तिथि शुरू होगी जो 28 अक्टूबर को सुबह 9.08 बजे तक रहेगी।

अमावस्या तिथि में मनाई जाती है दीपावली

हर साल कार्तिक मास की अमावस्या तिथि पर दीपावली मनाई जाती है। 27 अक्टूबर की सुबह रूप चतुर्दशी रहेगी और शाम को कार्तिक मास की अमावस्या तिथि में महालक्ष्मी पूजा होगी। 28 अक्टूबर को सूर्योदय काल तक अमावस्या रहेगी। 28 तारीख की सुबह 9.08 बजे के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि रहेगी, इस दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाया जाएगा। 29 अक्टूबर को भाई दूज का पर्व मनाया जाएगा।  

Posted By: Prateek Gupta

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