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18 साल बाद बिजली चोरी केस में बरी, कोर्ट ने आगरा पुलिस-बिजली विभाग को लताड़ा

Published: Wed, 01 Jul 2026 02:48 PM (IST)

बिजली चोरी के एक मामले में आगरा के कन्हैया लाल को 18 साल बाद निर्दोष बरी कर दिया गया है। ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर।

सांकेतिक तस्वीर।

HighLights

  1. कन्हैया लाल 18 साल बाद बिजली चोरी से बरी।

  2. न्यायालय ने बिजली विभाग, पुलिस की कार्यशैली पर टिप्पणी की।

  3. अवैध धन की मांग पूरी न होने पर झूठा केस।

जागरण संवाददाता, आगरा। बिजली विभाग के मनमानीपूर्ण रवैये के कारण बिजली चोरी दर्ज मुकदमे में खुद को निर्दोष साबित करने को युवक को 18 वर्ष लग गए। 18 वर्ष बाद आए फैसले में विशेष न्यायाधीश ईसी एक्ट पवन कुमार श्रीवास्तव ने साक्ष्य के अभाव में कन्हैया लाल निवासी गांव गुड़ा डौकी को बरी करने के आदेश दिए हैं।

पुलिस व बिजली विभाग की कार्यशैली पर तल्ख टिप्पणी कर अदालत ने आदेश में अंकित किया कि उपरोक्त विवेचना से बचाव पक्ष के तर्क को बल मिलता है कि विद्युत विभाग में कार्यरत तत्कालीन कर्मचारियों द्वारा विद्युत कनेक्शन प्रदान करने को अवैध धन की मांग की गई।

मांग पूरी नही होने पर कार्यालय से लिखा पढ़ी करके पुलिस में मिथ्या अभियोग पंजीकृत करा दिया गया और पुलिस ने भी प्रकरण की ठीक से जांच किए बिना आरोपपत्र दाखिल कर दिया।

बिजली चोरी में खुद को निर्दोष साबित करने में लग गए 18 वर्ष

डौकी थाने में वादी अवर अभियंता सुरेश चंद शंखवार ने कन्हैया लाल के विरुद्ध बिजली चोरी का मुकदमा दर्ज कराया था। दर्ज मुकदमे में उन्होंने कहा था कि पांच दिसंबर 2007 को विभाग की टीम के साथ विद्युत चेकिंग के दौरान आरोपित को बिना मीटर लगाए डायरेक्ट लाइन से आटा चक्की चलाकर बिजली चोरी करते पाया गया था। पुलिस ने कन्हैया लाल के खिलाफ 135 विद्युत अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया।

न्यायालय ने बिजली विभाग और पुलिस की कार्यशैली पर की टिप्पणी

अभियोजन की ओर से उक्त मामले में वादी मुकदमा अवर अभियंता सुरेश चंद शंखवार, छतर सिंह, एसआई राम खिलाड़ी, एसआई सोनपाल सिंह, विद्युत विभाग के कार्यकारी सहायक हिमांशु बजाज को गवाही के लिए अदालत में पेश किया गया।

विशेष न्यायाधीश ईसी एक्ट पवन कुमार श्रीवास्तव ने आरोपित के अधिवक्ता नरेंद्र सिंह पटेल के तर्क एवं पत्रावली के अवलोकन उपरांत आदेश में कहा कि बिजली विभाग एवं पुलिस ने न तो उक्त मामले में किसी स्वतंत्र गवाह को अदालत में पेश किया, न ही बिजली चोरी साबित करने के लिए कोई केबल या उपकरण अदालत में पेश किए।

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अदालत ने दिए आदेश

चेकिंग रिपोर्ट पर न तो आरोपित के हस्ताक्षर कराए गए, न ही उसकी प्रति आरोपित को दी गई। पुलिस ने भी बिना विवेचना किए विद्युत विभाग के कहने पर आरोपित के विरुद्ध अदालत में आरोप पत्र प्रेषित कर दिया।

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पुलिस ने ठीक से नहीं की जांच

अदालत ने अपने आदेश में अंकित किया कि उपरोक्त विवेचना से बचाव पक्ष के इस तर्क को बल मिलता है कि विद्युत विभाग में कार्यरत तत्कालीन कर्मचारियों द्वारा विद्युत कनेक्शन प्रदान करने के लिए अवैध धन की मांग की। मांग पूरी नही होने पर कार्यालय से लिखा पढ़ी करके पुलिस में मिथ्या अभियोग पंजीकृत करा दिया गया और पुलिस ने भी प्रकरण की ठीक से जांच किए बिना आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल कर दिया।