आगरा, जागरण संवाददाता। चंद्रशेखर आजाद...स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश सरकार को बेचैन कर देने वाला क्रांतिकारी। आजादी के लिए हद तक पार कर जाना और बेखौफ अंदाज, यही थी चंद्रशेखर की पहचान। 27 फरवरी 1931 को उन्होंने खुद को अंग्रेजों से घिरा पाकर अपनी ही पिस्तौल से गोली मार ली, जिससे कि अंग्रेज उन्हें जीवित न पकड़ सकें। इसी क्रांतिकारी के नाम से ताजनगरी में बना पार्क वीरान रहता है। आगरा किला और यमुना नदी के बीच में स्थित इस पार्क में कोई नहीं आता-जाता। हालांकि हरियाली और रंग-बिरंगे फूल 24 घंटे पहरा देते हैं।

यमुना नदी किनारे बने इस पार्क में चंद्रशेखर आजाद की विशाल प्रतिमा लगी है। लेकिन एक तरफ विद्युत शवदाह गृह और दूसरी तरफ नाला से उठती गंदगी के चलते यहां कोई नहीं आता। कभी-कभार आसपास के रिक्शे चालक जरूर दोपहर में आराम करने के लिए यहां आ जाते हैं। साफ-सफाई का भी अभाव रहता है। वैसे ये पार्क है काफी खूबसूरत। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे छायादार वृक्षों के बीच रंगे-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। नरम-नरम घास आकर्षक लगती है। बीच में एक टीले पर संगमरमर की बेंच भी रखी हुई है। यहां से ताजमहल सहज ही आकर्षित करता है। ताजमहल के साये में फोटाे खिंचवाने के लिए परफेक्ट फ्रेम बनता है। इतना खूबसूरत स्थान होने के बावजूद अव्यवस्थाओं के चलते यह चंद्रशेखर आजाद पार्क गुलजार नहीं हो पा रहा। 27 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित होने वाली गोष्ठियों में उनके विचारों और आदर्शों पर खूब प्रकाश डाला जाएगा लेकिन उनकी प्रतिमा पर दो फूल चढ़ाने वाले भी काफी कम ही लोग पहुंचते हैं। 

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