आगरा, जागरण संवाददाता। पैदा होने के बाद बच्चा सही ढंग से सुन पा रहा है या नहीं इसका पता चार से पांच माह बाद ही लगा लेना चाहिए। इस उम्र में यदि बच्चा किसी के आवाज लगाने पर सिर घुमाना शुरू कर दे तो इसका मतलब है कि वो सुन पा रहा है, इसके विपरीत यदि वह आवाज लगाने पर सिर नहीं घुमा रहा है तो माता-पिता को सावधान हो जाना चाहिए और तुरंत विशेषज्ञ डाॅक्टर के पास जाना चाहिए। यह कहना है वरिष्ठ ईएनटी विशेषज्ञ डा. रजत कपूर का।

सिकंदरा स्थित रेनबो हाॅस्पिटल में शनिवार को मीनाक्षी स्पीच एं हेयरिंग क्लीनिक के सहयोग से काॅकलियर इंप्लांट कैंप आयोजित किया गया। इसकी थीम थी कि सुनेंगे नही तो बोलेंगे कैसे! डा. रजत कपूर ने बताया कि माता-पिता अक्सर बच्चों के न सुनने, कम सुनने की समस्याओं को नजर अंदाज कर देते हैं और जब डाॅक्टर के पास आते हैं काफी समय बर्बाद हो चुका होता है। समस्या बढ जाती है जबकि उसे वहीं रोका जा सकता था। रोग को सही समय पर पहचान कर इलाज कराने से वह बढ़ता नहीं है। बच्चा अगर ठीक से सुन नहीं पा रहा तो बचपन में उसे हेयरिंग मशीन लगाई जा सकती है, इससे भी काम नहीं चलता तो काॅकलियर इंप्लांट कराया जाता है। हालांकि यह खर्चीला होता है लेकिन काॅकलियर इंप्लांट की मदद से वह सुन सकता है, जब वह सुनता है तभी बोलता है। ऐसे में उसके लिए आगे स्कूल के दरवाजे खुलते हैं और ऐसे बच्चों का भविष्य भी दूसरों की तरह सुनहरा हो सकता है। डा. रजत ने बताया कि बच्चों की श्रवण शक्ति के मामले में जागरूकता का न होना एक बडी चुनौती है। एक तो लोग इसे नजरअंदाज करते हैं। इलाज है लेकिन इसके बारे में उन्हें पता नहीं है। ऐसी स्थिति में हम बच्चों का भविष्य खतरे में डालते हैं। आजकल बच्चों की जांच पैदा होने के 48 घंटों के भीतर ही करवाई जा सकती है, जिससे यह पता चलता है कि उसे हेयरिंग से जुड़ी कोई समस्या तो नहीं है। लोगों को इसकी मदद लेनी चाहिए।

शिविर में 25 बच्चों ने काॅकलियर इंप्लांट के लिए रजिस्ट्रेशन कराए थे। इन्हें परामर्श प्रदान किया गया। डा. रजत ने बताया कि हम कोशिश करते हैं कि बच्चों के लिए रियायती दरों पर यह सुविधा उपलब्ध हो सके।

ऐसी स्थिति में लगता है काॅकलियर इंपलांट

डाॅक्टरों के अनुसार बहुत ज्यादा बहरेपन की स्थिति में काॅकलियर इंप्लांट का इस्तेमाल किया जाता है। मसलन पैदाइशी बहरेपन की स्थिति में। इस स्थिति में बच्चे की भाषा विकसित नहीं हो पाती और ऐसे बच्चे गूंगे और बहरे कहलाते हैं। इन बच्चों के लिए एक ही इलाज है, जिसे काॅकलियर इंप्लांट कहते हैं। आॅपरेशन के बाद कुछ समय तक बच्चे को स्पीच थैरेपी दी जाती है।

बच्चों के कानों की हुई जांच

आॅडियोलाॅजिस्ट अमित कुमार ने बच्चों के कानों की जांच की। इस दौरान सात साल तक की उम्र के बच्चों का काॅकलियर इंप्लांट के लिए चयन किया गया जो जन्म से गूंगे बहरे थे। शिविर में कान से संबंधित बीमारियों जैसे सुनने की समस्या, कान के बहने की समस्या, काॅकलियर इंप्लांट परामर्श, मूक-बधिरता आदि की समस्याओं से पीड़ित बच्चों की भी जांच की गई और परामर्श दिया गया।

 

Posted By: Tanu Gupta

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