आगरा, जागरण संवाददाता। उत्तराखंड की राज्यपाल पद से इस्तीफा देने के बाद बेबीरानी मौर्य को लेकर लगाए जा रहे कयासों पर सोमवार को विराम तब लगा जब उन्हें भाजपा ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। सक्रिय राजनीति में उनकी वापिसी के अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं, तो संगठन ने अनुसूचित वर्ग की राजधानी कहे जाने वाले आगरा को बड़ी जिम्मेदारी देकर फिर नीले खेमें में सेंध लगाने का प्रयास किया है।

विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा मोर्चा, प्रकोष्ठ के सहारे अपने घर बैठे हर कार्यकर्ता को सक्रिय बनाने के लिए जिम्मेदारी सौंप रही है, तो दूसरे दलों के वोटरों में सेंध लगाने का प्रयास किया जा रहा है। अनुसूचित वर्ग का गढ़ कहा जाने वाला आगरा से पार्टी ने डा. जीएस धर्मेश को राज्यमंत्री की जिम्मेदारी दी तो एससी आयोग का प्रदेशाध्यक्ष डा. रामबाबू हरित को बनाया। वहीं बेबीरानी मौर्य को भी उत्तराखंड का राज्यपाल बनाया था। राजनीतिक कारणों से उन्होंने राज्यपाल पद नौ सितंबर को इस्तीफा दिया तो उनको संगठन से लेकर सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलने के कयास लगाए जा रहे थे। पार्टी भी उनके चेहरे को भुनाने के प्रयास में जुटी है, इसलिए उन्हें संगठनात्मक जिम्मेदारी सौंपी गई है। राष्ट्रीय पद देने के बाद पार्टी अब उनके सहारे बसपा के परंपरागत वोटों में पकड़ बनाने का प्रयास करेगी। बेबीरानी मौर्य राज्यपाल रहते हुए भी आगरा में सक्रियता रही थी, लेकिन अब उन्हें आगरा में कितना समय मिलेगा ये तो पार्टी तय करेगी।

मेयर से लेकर आयोग तक की रही है जिम्मेदारी

वर्ष 1995 में बेबीरानी मौर्य का भाजपा के साथ राजनीतिक सफर शुरू हुआ था, इससे पहले वे घरेलू महिला थीं। पार्टी में आते ही उन्हें मेयर पद के लिए मैदान में उतारा गया था। वे आगरा की पहली महिला मेयर बनी थीं। वर्ष 1997 में बेबीरानी मौर्य को भाजपा के राष्ट्रीय अनुसूचित मोर्चा की कोषाध्यक्ष बनाया गया तो वर्ष 2002 में राष्ट्रीय महिला आयोग का सदस्य बनाया गया था। वर्ष 2007 में उन्हें भाजपा ने एत्मादपुर विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा था, लेकिन हार का सामना करना पड़ा था। 2018 में उन्हें बाल अधिकार संरक्षण आयोग का सदस्य बनाया गया था। वे उस समय विदेश में थीं। जब तक पदभार ग्रहण करती तब तक राज्यपाल के लिए उनकी घोषणा हो गई थी।

Edited By: Prateek Gupta