आगरा, जेएनएन। लोकसभा चुनाव के परिणाम चौंकाने वाले रहे हैं। खासकर मैनपुरी संसदीय सीट पर तो भाजपा और गठबंधन, दोनों की स्थितियां कई बूथों पर खराब रही हैं। भले ही गठबंधन के प्रत्याशी की जीत हुई लेकिन किसी दौर में सपा का अभेद्य गढ़ रहा किला बहुत हद तक दरक गया। उधर जीत के बावजूद घटते वोट बैंक को लेकर गठबंधन के नेता परेशान हैं तो इधर भाजपाई अपने प्रत्याशी की हार से शोकमग्न हैं। ऐसे में अब दोनों ही दलों के सिपहसालारों की कुर्सियां डगमगाने लगी हैं।

हाईकमान की कार्रवाई का डर नेताओं को सताने लगा है। मैनपुरी समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता रहा है लेकिन इस बार सपा-बसपा ने गठबंधन कर इस गढ़ के महारथी रहे मुलायम सिंह यादव को मैदान में उतार दिया। उधर, भाजपा ने मोदी नाम के सहारे शाक्य वोटों का आंकलन कर प्रेम सिंह शाक्य को टिकट दिया। परिणाम चौंकाने वाले रहे। जो मुलायम सिंह यादव पिछले सभी लोकसभा चुनावों में मैनपुरी से तीन से चार लाख वोटों से जीत दर्ज किया करते थे, मोदी लहर में उनकी जीत तो हुई लेकिन जीत के अंतर में वे एक लाख का आंकड़ा भी न छू सके।

केंद्र और प्रदेश में सत्तासीन होने से भाजपा दोगुने जोश से लबरेज थी। लिहाजा, मैनपुरी की सीट पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया। पहले टिकट वितरण में विलंब हुआ, उसके बाद प्रचार-प्रसार में। परिणाम यह हुआ कि प्रत्याशी ने टक्कर तो दी लेकिन मोदी लहर के बावजूद सपाई दुर्ग ढहाने में नाकाम रहे। परिणामों के बाद अब हार के कारणों पर मंथन शुरू हुआ है। हाईकमान ने बूथवार समीक्षा शुरू कर दी है। ऐसे में मैनपुरी में भाजपा के कई दिग्गज पदाधिकारी परेशान हैं। हर किसी को कार्रवाई का डर सता रहा है।

 

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Posted By: Prateek Gupta

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