आगरा, संजय त्रिवेदी। 'तुझे नौ महीने कोख में पाला। जन्म लेते ही खुशी छाई। तेरी किलकारियों से आंगन गूंजता रहा। तू तो मेरे जिगर का टुकड़ा है। मगर, मैं क्या करती? यहां पर तेरे पालन-पोषण के भी लाले हैं। मैं तो तकलीफ झेल लूंगी, लेकिन तुझे रोते हुए कैसे सहन कर पाती। जमाना तो मुझे बेरहम कहेगा, मगर मैं बेबस हूं। और हां, तू मुझे भले ही न पहचान पाए, लेकिन मैं तो ऐसी जगह छोड़कर जा रही हूं कि जब चाहूं तब निहार लूंगी।'
 बेवर के काजीटोला मुहल्ले में एक मकान के दरवाजे पर गुरुवार रात दो माह के बेटे को छोड़कर गई अभागिन शायद यही कह रही होगी। उसकी गर्दिश का अंदाजा इसी बात से लगाया जा रहा है कि बच्चा फटे-पुराने कंबल में लिपटा था। बेटे के शरीर पर बेहद हल्के कपड़े थे। न सिर पर टोपा था और न पैरों में मोजे। मुहल्ला काजीटोला निवासी धर्मेंद्र कुमार के दरवाजे की कुंडी बजी तो परिजन एक बार चौंक गए थे। तरह-तरह की आशंका लिए जैसे ही दरवाजा खोला तो बाहर जमीन पर शिशु देख दंग रह गए। कड़ाके की सर्दी में ठिठुर रहे शिशु को आनन-फानन अंदर लाए। गरम कपड़ों में लपेटा। धर्मेंद्र की पत्नी नीतू ने तो उसे अपने आंचल में छिपा लिया। बच्चा लावारिस था। लोगों ने पूरे मुहल्ले में ऐसी महिला के बारे में तहकीकात की। पुलिस भी आ गई। कोई सुराग न मिलने पर पुलिस ने रातभर के लिए शिशु को नीतू के पास छोड़ दिया।


सर्दी में बच्चे को मारना चाहते हो?
 शुक्रवार सुबह बाल कल्याण समिति ने बालक को शिशु गृह भेजने की बात कही तो नीतू बिफर पड़ी। बोली, सर्दी में बालक को मारना चाहते हो क्या? ऐसी ठंड में मासूम को मां की ममता की गर्मी चाहिए। वहां कौन सीने से लगाएगा। नीतू शिशु को अपनी सुपुर्दगी में देने की गुहार करने लगीं। समिति की सदस्य आराधना गुप्ता ने बताया कि समिति ने शिशु को दो महीने के लिए नीतू की सुपुर्दगी में देने का निर्णय लिया है।
 
नाम दिया वैभव, पूरा परिवार खुश
नीतू दो बेटियां व एक बेटे की मां हैं। शिशु को भी वह अपना बेटा मानने लगी है। शिशु का नाम वैभव रखा है। शिशु को लेकर नीतू के तीनों बच्चे भी बहुत खुश है।  

Posted By: Prateek Gupta

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