आगरा, जागरण संवाददाता। रमजान किसी इम्तहान से कम नहीं। इसमें केवल भूखे-प्यासे ही रहना नहीं होता, बल्कि खुद पर नियंत्रण रखने का नाम रोजा है। इस बार कोरोना संक्रमण काल के बीच पहला अशरा गुजर रहा है।

जामा मस्जिद में आनलाइन दुआ कराते हुए इस्लामिया लोकल एजेंसी के चेयरमैन हाजी असलम कुरैशी ने यह बात कही। इस दौरान असलम कुरैशी ने कहा कि रमजान का पहला अशरा रहमत का होता है, दूसरा मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का और तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से खुद को बचाने के लिए होता है। इस तरह हर अशरा अपने आप में बहुत ही अहम है। शुक्रवार को पहला अशरे के बाद शनिवार को दूसरा अशरा शुरु होगा। पहले अशरे में हमें रहमत मिल जाए, इसके लिए कोशिश करनी होगी। इस बार हर मुसलमान रोजे रखते हुए कुछ और भी एहतराम करेगा, जो हुकूमत की ओर से बताए गए हैं। यह पूरी इंसानियत के लिए जरूरी है। हम सभी को अपने घरों से न तो निकलना है और न ही नमाज के लिए मस्जिदों तक जाना है। अपने घरों पर रहें और वहीं इबादत करें।

इधर, रोजेदारों का नौवां रोजा गुरुवार को अल्लाह की इबादत में गुजरा। तड़के सहरी और नमाज के साथ रोजा की शुरुआत हुई। इसके बाद शाम को लोगों ने घरों में ही नमाज अदा कर स्वजन संग इफ्तारी की। ये करें-

1. सेहरी के बाद सोएं नहीं, बल्कि फज्र की नमाज अदा करें।

2. सुबह सादिक के साथ ही कुरआन-पाक की तिलावत करें।

3. फज्र से लेकर इशा और तरावीह तक की नमाज घर पर पढ़ें।

4. तिलावत और नमाज के लिए ऐसी जगह चुनें, जहा बिल्कुल खामोशी हो।

5. इफ्तार तैयार हो, तो पहले जरूरतमंदों का ख्याल रखें। ये न करें-

1. घर पर नमाज पढ़ते समय पड़ोसियों को कतई न बुलाएं।

2. किसी भी तरह की इफ्तार दावत का आयोजन न करें।

3. कोई अगर इफ्तारी के लिए घर बुलाए, तो बिल्कुल न जाएं।

4. मगरिब की नमाज के बाद टहलने के लिए बाहर न निकलें।

5. रोजे का अनुभव शेयर करने के लिए चौराहे पर न जुटें।

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