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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 07, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

इस तरह मन उत्साह और आनंद से आवेशित हो जाएगा

By Preeti jhaEdited By:
Published: Fri, 07 Aug 2015 09:28 AM (IST)Updated: Fri, 07 Aug 2015 09:31 AM (IST)

अपनी संकुचित भावना को विस्तार दें। जीवन में केवल अपने बारे में सोचना और अपने लिए करना दुख को न्योता ...और पढ़ें

इस तरह मन उत्साह और आनंद से आवेशित हो जाएगा
इस तरह मन उत्साह और आनंद से आवेशित हो जाएगा

अपनी संकुचित भावना को विस्तार दें। जीवन में केवल अपने बारे में सोचना और अपने लिए करना दुख को न्योता देना है। जब हम दूसरों के लिए कुछ करते हैं तो मन को असीम आनंद मिलता है। दूसरों के सुख, सफलता और विकास में अपना सुख देखें, ऐसा भाव मन में पैदा हो कि दूसरों की खुशियां आपको सुख देने लगें, तो दुख स्वत: मिट जाएगा। सेवा भाव से किए गए कार्य का फल जब दूसरों की खुशी के रूप में आता है तो अपना मन आंतरिक रूप से प्रफुल्लित हो जाता है। इसलिए पर हितार्थ किया गया कार्य आत्मसंतुष्टि और निर्विकार आनंद देता है।
अपनी दुनिया से बाहर निकलकर देखें तो पाएंगे कि करोड़ों लोग दुखी हैं, उनके सामने हमारा दुख तो कुछ भी नहीं है। उन्हें हमारी सहायता की जरूरत है, तब अपना दुख पीड़ित नहीं करेगा। इसलिए संकुचित भावना का विस्तार दुख निवारण का सवरेत्तम उपाय है। कहा जाता है कि किसी रेखा को छोटी करने के लिए एक बड़ी रेखा खींचनी पड़ती है। स्वयं को किसी बड़े लक्ष्य से लैस कर लीजिए। उसी लक्ष्य की पूर्ति में मन को डुबा दीजिए, देखिए कि छोटी-मोटी परेशानी, मन का अहंकार, ईष्र्या आदि नकारात्मक भाव स्वत: मिटने लगेंगे।
मन उत्साह और आनंद से आवेशित हो जाएगा। दुख का बुलबुला जीवन की लहरों में तल पर ही उठता है, मनुष्य जैसे-जैसे ऊंचा सोचने और सामाजिक या मानव हित के लिए कार्य करना शुरू करता है तो ये बुलबुले स्वत: शांत हो जाते हैं। छोटी-मोटी समस्याएं परेशान नहीं करती हैं। दूसरी ओर जब समुदाय के साथ हम अपना दुख मिला देते हैं या ऐसे कहें कि बड़ी समस्या या बड़े संकट का हल पूरे समुदाय द्वारा किया जाता है तो दुख का बोझ हल्का हो जाता है। इसलिए मनुष्य को सामाजिक प्राणी माना गया है। सच तो यह है कि सामाजिक जीवन का ही संकुचन हो गया है। जीवन व्यक्ति केंद्रित होता जा रहा है। इसलिए मानव जीवन को समाजोन्मुख बातचीत से उसे दुख के भंवरजाल से मुक्त किया जा सकता है। अध्यात्म तो प्रकृति की मूल चेतना की बात करता है, जहां न सुख होता है, न दुख होता है। सुख-दुख बाहर का भाव है, जैसे समुद्र में लहरें ऊपर ही दिखती हैं, तल में तो समुद्र बिल्कुल शांत है। हमारा जो भीतर का आकाश है, वहां सुख-दुख सम है।