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नैतिकता की अवधारणा

भारतीय संस्कृति में नैतिकता की अवधारणा में अनेक गुणों को शामिल किया गया है। मानवीय एकता, सत्य पर विश्वास, उदारता, अन्याय के प्रति संघर्ष, साहस, सच्चरित्रता, निस्पृहता, सहानुभूति, संवेदना और समन्वयवादी दृष्टिकोण आदि को नैतिकता की अवधारणा में ही शामिल किया जाता है। इन्हीं सदगुणों के आधार पर मनुष्य मनुष्य बना रह सकता है और विश्

By Edited By: Published: Tue, 11 Feb 2014 10:52 AM (IST)Updated: Tue, 11 Feb 2014 10:52 AM (IST)
नैतिकता की अवधारणा
नैतिकता की अवधारणा

भारतीय संस्कृति में नैतिकता की अवधारणा में अनेक गुणों को शामिल किया गया है। मानवीय एकता, सत्य पर विश्वास, उदारता, अन्याय के प्रति संघर्ष, साहस, सच्चरित्रता, निस्पृहता, सहानुभूति, संवेदना और समन्वयवादी दृष्टिकोण आदि को नैतिकता की अवधारणा में ही शामिल किया जाता है। इन्हीं सदगुणों के आधार पर मनुष्य मनुष्य बना रह सकता है और विश्व के समक्ष आदर्श उपस्थित कर सकता है। मेरी दृष्टि में कोई भी आदमी फरिश्ता नहीं होता, विशेषताओं के साथ कमियों की संभावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता। बावजूद इसके हर इंसान का मन इस बात के लिए जागरूक बने कि मैं बुराइयों को मिटाने का तो दावा नहीं कर सकता, लेकिन अपने स्वयं के जीवन में बुराइयों के आने के दरवाजों को अवश्य बंद रखूंगा। इसी संकल्प से एक अच्छे इन्सान की तलाश का काम पूरा हो सकता है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने इस संदर्भ में कहा है कि जब व्यक्ति अपने आपको नहीं देख पाता, तब हजारों-हजारों समस्याएं पैदा होती चली जाती हैं। इनका कहीं अंत नहीं होता। गरीबी की समस्या हो, मकान और कपड़े की समस्या हो ये सारी की सारी गौण समस्याएं हैं, मूल समस्याएं नहीं हैं। ये पत्तों की समस्याएं हैं, जड़ों की नहीं हैं। पत्तों का क्या? पतझड़ आता है, सारे पत्ते झड़ जाते हैं। वसंत आता है और सारे पत्ते आ जाते हैं, वृक्ष हरा-भरा हो जाता है। यह मूल समस्या नहीं है।
मूल समस्या यह है कि व्यक्ति अपने आपको नहीं देख पा रहा है। उसके पीछे ये पांच कारण या समस्याएं काम कर रही हैं। पहला, मिथ्या दृष्टिकोण, दूसरा असंयम, तीसरा प्रमाद, चौथा कषाय, पांचवां चंचलता। जैन-दर्शन के अनुसार ये पांच मूल समस्याएं हैं। यही वास्तव में दुख हैं। यही दुख का चक्र हैं। जब तक दुख के इस चक्र को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक जो सामाजिक, मानसिक और आर्थिक समस्याएं हैं, उनका सही समाधान नहीं हो सकेगा। समय-सापेक्ष जीवन मूल्यों को आचरण में लाने के लिए हमें दायित्व और कर्तव्य की सीमाओं को समझना होगा। आंखों के सामने जो कुछ हो रहा है उसे सिर्फ देखना ही नहीं, अच्छे-बुरे का विवेक जगाना होगा।
[ललित गर्ग]


पढ़े: जीवन का अर्थ


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