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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 14, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

आत्मा को अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए देह में प्रवेश करना ही पड़ता है

By Preeti jhaEdited By:
Published: Wed, 14 Sep 2016 11:14 AM (IST)Updated: Wed, 14 Sep 2016 11:16 AM (IST)

यदि इस दुर्लभ देह से यह सब कुछ न हुआ तो यह जीवन पशुओं के जीवन से भला किस रूप में श्रेष्ठतर है?

आत्मा को अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए देह में प्रवेश करना ही पड़ता है
आत्मा को अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए देह में प्रवेश करना ही पड़ता है

देह में आत्मा का संचार करने वाले करुणानिधान प्रभु हर जीव को विशिष्ट गुण, क्षमता व कौशल देकर संसार में भेजते हैं। संसार में आने वाले हर प्राणी को ईश्वर विशेष कार्य के उद्देश्य से भेजते हैं। यह देह जीव को ईश्वर की ओर से, निर्धारित कालावधि के लिए पट्टे पर मिली दुर्लभ भूमि की तरह मिली हुई है, जो आपको कुछ दुर्लभ, अनूठा व अविस्मरणीय करने के लिए ईश्वर से उपहार रूप में प्राप्त है। वास्तव में इस पर आपका कोई स्वामित्व व अधिपत्य नहीं है। आपके सद्कर्मो से प्रेरित होकर अथवा आपके बुरे कामों से क्रोधित होकर वह इस कालावधि में कुछ विस्तार व परिवर्तन स्वत: ही कर सकते हैं।
यह पट्टावधि ईश्वर ने केवल करुणावश आपको इस दुर्लभ मानव जीवन को उपयोगी, ऐतिहासिक व उत्प्रेरक बनाने के लिए और भविष्य को संवारने के लिए आपको संविदा पर दे दी है। तभी तो यह दुर्लभ मौका मिला है कि हम उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनें और अतीत से सबक लेकर भविष्य को उद्देश्यपूर्ण बनाएं। संगति में आसक्ति और आसक्ति में ही नैसर्गिक रूप में दुख छिपा रहता है। हमें जो सुख दिखाई दे रहा है, वह हमारी कृत्रिम आंखों से दिख रहा है, जो महज अज्ञानता का प्रतीक है। भौतिक संसार के हर सुखी लगने या दिखने वाले पदार्थ, वस्तु अथवा आकर्षण के मूल में पीड़ा व पश्चाताप का सर्प कुंडली मारकर बैठा रहता है। आनंद की असली खुशी प्रभु नाम सुमिरन से ही मिलती है। इस दुर्लभ देह मिलने का असली सुख भी तभी है, जब इसके उपयोग से मानव और मानवता का कल्याण हो। यदि इस दुर्लभ देह से यह सब कुछ न हुआ तो यह जीवन पशुओं के जीवन से भला किस रूप में श्रेष्ठतर है?
हाड़-मांस की इस देह से ही ईश्वर वह कार्य कराते हैं, जो आने वाले समय व इतिहास के लिए अनुकरणीय व संग्रहणीय बन जाता है। यह देह उस प्रभु का सक्षम व समर्थ अश्व है। धर्म, अध्यात्म व दर्शन की पृष्ठभूमि में यह चेतन देहधारी जीव ही मुख्य भूमिका में रहता है। आत्मा को अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए देह में प्रवेश करना ही पड़ता है। देह की आधारशिला पर ही आत्मा अपने अभीष्ट के नीड़ का निर्माण करती है। इसी नीड़ में विचार, कर्म, तप, साधना, दर्शन व अध्यात्म के विशाल ज्ञानरूपी खग-विहग पल्लवित-पुष्पित होते हैं, जो कालांतर में मूल्यों का संरक्षण कर भटकती मानवता को दृष्टि और दिशा देकर देह की सार्थकता सिद्ध करते हैं।