यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 25, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
अनमोल वचन
तुलसीदास जी कहते हैं, जब कभी युद्ध होता है, तो शूरवीर युद्ध के मैदान में खड़े होकर शूरवीरता का कार्य ...और पढ़ें

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।
- तुलसी दास
तुलसीदास जी कहते हैं, जब कभी युद्ध होता है, तो शूरवीर युद्ध के मैदान में खड़े होकर शूरवीरता का कार्य करते हैं, शूरवीरता का बखान नहीं करते। शत्रु को युद्ध में उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रताप की डींग मारा करते हैं।
भावार्थ : व्यक्ति को अपने कर्म पर विश्वास होना चाहिए। उसे कर्म करना चाहिए, यह नहींजताना चाहिए कि वह कितना काबिल है। जब व्यक्ति के मन में यह आ जाता है कि वह तो बहुत काबिल है, तो उसके इस अहंकार से उसका ध्यान कर्म से हटने लगता है। अपनी काबिलियत की डींग हांकने वाला दरअसल काबिल नहीं होता। अपनी काबिलियत अगर दिखानी ही है, तो अपने काम से दिखानी चाहिए, अपनी बातों से नहीं।
मन
विचारों की शक्ति को तभी समझा जा सकता है, जब मन शांत होगा। मन शांत तब होगा, जब आपके अंदर नकारात्मक विचारों की संख्या कम होगी। इसका सबसे आसान तरीका है, जब भी लक्ष्य से भटकाने वाले नकारात्मक विचार आएं, तो उनके उत्पन्न होते ही ध्यान में बैठ जाएं। ध्यान के दौरान कौन विचार अच्छे हैं और कौन बुरे, इसे समझने की कोशिश करें। सकारात्मकता को आगे बढ़ाएं, नकारात्मकता को पीछे ढकेलें। इसमें पारंगत होते ही आप देखेंगे कि सिर्फ सकारात्मक विचारों का ही मन में आगमन हो रहा है।
वचन
सोच-समझकर किसी व्यक्ति से वादा करें। अगर आपने किसी को कुछ देने या किसी कर्तव्य के निवर्हन का वचन दे दिया है, तो उसके पाबंद भी बनें। वचन की पाबंदी व्यक्तित्व में चार चांद लगाती है।
कर्म
अपने कार्यक्षेत्र में संचालनकर्ता या प्रबंधक के पद पर आसीन हैं, तो अलग-अलग पहलुओं की जांच किए बिना त्वरित टिप्पणी या त्वरित निर्णय आपके व्यक्तित्व के खोखलेपन को दर्शाता है। प्रेमचंद के पंच-परमेश्वर की तरह लिया गया सही निर्णय न सिर्फ स्वयं की नजरों में उठाएगा, बल्कि दूसरों के लिए भी आप उदाहरण बन जाएंगे।
